बौद्ध धर्म ने कैसे समाज को पलायनवादी अपराधी और पुरुषार्थ विहीन बना दिया था ! : Yogesh Mishra

आज से लगभग 2500 साल पहले बौद्ध धर्म का उत्थान एक निराशावादी, पलायनवादी, अनुभव विहीन, अनपढ़, राजकुमार के द्वारा हुआ था ! पूरा बौद्ध धर्म सनातन धर्म विरोधी ज्ञान नास्तिकता, शिथिल मध्यम मार्ग और शून्यवाद पर टिका हुआ था ! बुद्ध स्वयं तो मांसाहारी थे पर वह वेदों और यज्ञों का विरोध करने के लिये पशु बलि रोकने के नाम पर अहिंसावाद का सहारा लेते थे !

जबकि सर्वाधिक युद्ध उन्हीं के अनुयायियों ने ही किये ! यहाँ तक कि 80 साल की उम्र में सड़ा हुआ मांस खाकर मरने के बाद भी बुद्ध के अनुयायियों ने उनकी अन्तेष्ठी के लिये आठ दिन तक युद्ध लड़ा और इस युद्ध में हजारों लोगों की जान गई ! यह तो भला हो सनातन धर्मी द्रोण मिश्र ब्राह्मण का जिसने आपसी समझौता करवा कर युद्ध समाप्त करवा दिया और तब आठ दिन पुरानी सड़ी हुई लाश की अन्तेष्ठी की जा सकी !

गौतम बुद्ध के मरणोपरांत उनके शिष्यों ने गौतम बुद्ध की विचारधारा से समर्थित राजाओं के सहयोग से बड़े-बड़े बौद्ध विहारों की रचना की ! इनमें से अधिकांश वह स्थल थे जो कभी सनातन धर्मियों के गुरुकुल हुआ करते थे अर्थात दूसरे शब्दों में कहा जाये कि सनातन धर्मयों के गुरुकुलों को इन बौद्ध अनुयायियों ने राजा के सहयोग से छीन लिया और उन्हें बौद्ध विहार बना कर उनमें बुद्ध के मूर्तियों की स्थापना कर दी और वहां पर जो शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा दी जाती थी ! उसको पूरी तरह बंद करवा दिया और अपने तथाकथित अहिंसावादी बौद्ध धर्म की शिक्षा आरंभ कर दी !

उसका परिणाम यह हुआ कि समाज अपने कर्तव्य से विमुख हो गया ! ब्राह्मणों ने बौद्ध अनुयायी राजाओं के भय से सनातन धर्म के अनुसार शिक्षा देना बंद कर दिया और क्षत्रियों ने सनातन धर्म के शास्त्र शिक्षा के आभाव में धर्म युद्धों को अहिंसा के नाम पर त्याग दिया ! अर्थात राष्ट्र और समाज की रक्षा के लिये युद्ध करना बंद कर दिया ! क्षत्रियों द्वारा सुरक्षा न मिलने की स्थिती में असुरक्षित वैश्य समाज ने जो व्यापार और कृषि आदि करके समाज का पोषण करता था ! वह मात्र अपने निजी पोषण के लिये ही व्यापार व्यवसाय करने लगा !

शूद्र वर्ग जो वैश्य वर्ग का सहयोगी था ! वह कार्य न करना पड़े इसलिये सिर मुंडवा कर, भगवा वस्त्र पहनकर बौद्ध धर्म अनुयायी हो गया क्योंकि बौद्ध विहारों में बिना किसी परिश्रम के राजाओं के सहयोग से भरपेट भोजन और विलासिता पूर्ण जीवन यापन के लिये सभी संसाधन उपलब्ध थे ! अतः इस तरह धीरे-धीरे संपूर्ण समाजिक वर्ण व्यवस्था ध्वस्त हो गई !

इसी बीच बहुत से ऐसे नास्तिक महात्मा भी हुये जो नास्तिक दर्शन पर बात करते थे ! जिनमे सबसे मशहूर चार्वाक थे ! इनके दर्शन को चार्वाक दर्शन कहते हैं ! इनका मुख्य उपदेश यह था कि जीवन में स्वाभिमान और सम्मान जैसी कोई चीज नहीं होती है ! चाहे कुछ भी हो जाये चाहे उधार मांग कर ही घी पीना पड़े तो पियो अर्थात कैसे भी उधार से, लूट के, मांग कर या छीन कर जैसे भी बस जिंदगी के मजे करो ! जब तक आप जीवित हैं तभी तक जीवन है ! बाँकी और कहीं कुछ नहीं है ! कर्म फल, पाप पुण्य, मोक्ष जैसा कुछ भी नहीं होता है ! बौद्ध धर्म के प्रभाव में अधिकांश विलासी राजाओं ने चार्वाक दर्शन का यह मार्ग भी अपनाया था !

लोगों ने विवाह करने बंद कर दिये ! बौद्ध विहारों में भीड़ बढ़ने लगी ! लोग अपने दांपत्य जीवन से पलायन करने लगे ! उसका परिणाम यह हुआ कि आर्यावर्त में जनसंख्या तेजी से गिरने लगी ! तब कुछ तत्कालीन राजाओं ने बौद्ध अनुयायियों को गृहस्थि की तरफ वापस मोड़ने के लिये खजुराहो जैसे काम मंदिरों का निर्माण करवाना शुरू किया ! जिसमें बाहर तो काम की व्याख्या थी ! लेकिन अंदर धर्म की ! बहुत से राजाओं ने अपना सर्वस्व त्याग कर सामाजिक व्यवस्था को पुनः जीवित करने के लिये भरसक प्रयास किया !

इसी बीच आदि गुरु शंकराचार्य और मंडन मिश्र ने मिल कर भारत के अंदर से बौद्ध धर्म को उखाड़ फेंका ! उनकी नागा सेना ने समस्त बौद्ध विहार नष्ट कर दिये ! जिस वजह से बौद्ध धर्म अनुयाई जो भारत के बाहर थे ! वह अब सनातन धर्मीं भारत का सर्वनाश देखना चाहते थे ! इसलिये उन्होंने मुगल लुटेरों को भारत आने के लिये प्रेरित किया और उन्हें पूरा सहयोग दिया ! यह बात अलग है कि कालांतर में जब मुग़ल लुटेरे सशक्त हो गये ! तो उन्होंने सबसे पहले बौद्ध विहारों को ही लूटना और नष्ट करना शुरू कर दिया फिर जिन स्थानों पर कभी बौद्ध धर्म का प्रभाव था ! वहां इस्लाम का दबदबा हो गया !

क्योंकि सनातन गुरुकुल ख़त्म हो चुके थे ! शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा पूरी तरह ख़त्म हो चुकी थी ! अत: क्षत्रिय राजा अहिंसा का पाठ पढ़ते पढ़ते इतना अधिक अहिंसक हो गये थे कि यह क्षत्रिय राजा अपनी रक्षा करना ही भूल गये थे ! इनमें कायर और नपुंसकता उनके अन्दर तक बस गई थी ! इसीलिये यह लोग मुग़ल आक्रान्ताओं से युद्ध नहीं करना चाहते थे ! अत: समझौता करने लगे और मुग़ल सल्तनत के आधीन ही नहीं हुये बल्कि उन्हें अपनी बहू बेटियां भी उनके भोग विलास के लिये उपहार में देने लगे ! यह पलायनवादी पुरुषार्थ विहीन समाज बौद्ध धर्म की ही देन थी !

अपने बारे में कुण्डली परामर्श हेतु संपर्क करें !

योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

 -: सम्पर्क :-
-090 444 14408
-094 530 92553

comments

Check Also

बौद्ध धर्म की उत्पत्ति और विकास में सहायक लोगों का परिचय : Yogesh Mishra

बौद्ध धर्म कभी धर्म प्रचारक आंदोलन के रूप में विकसित नहीं हुआ था ! किन्तु …