रावण के द्वारा रचे गये शास्त्रों की सूची : Yogesh Mishra

अभी कुछ दिन पहले मैंने एक कमेंट डाला था कि महापंडित रावण में अपने जीवन काल में 2700 से अधिक विभिन्न तरह के विभिन्न ग्रंथों का निर्माण किया था ! जिस पर मेरे कुछ साथियों ने यह आग्रह किया कि इस संदर्भ में मैं एक विस्तृत लेख लिखूं ! अत: यह वर्तमान लेख आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ !

इस लेख को पढ़ने के बाद यह एक स्वाभाविक प्रश्न खड़ा होता है कि यदि रावण द्वारा अपने जीवन काल में 2700 से अधिक तरह-तरह के ग्रंथों का निर्माण किया गया था तो यह ग्रंथ आज जनसामान्य के अध्ययन के लिये उपलब्ध क्यों नहीं हैं !

इस संदर्भ में मैं आपको यह सूचित करना चाहता हूं कि रावण के काल में भारत में दो संस्कृतियों परस्पर एक-दूसरे के साथ संघर्ष चल रहा था ! पहला शैव संस्कृति जो भारत की मूल संस्कृति थी ! दूसरा बाहर से आई हुई आयातित वैष्णव संस्कृत जो विवत्स्य मनु के साथ भारत आई थी और राम के समय तक यह भारत में पूरी तरह स्थापित हो चुकी थी और गुरुकुलों के माध्यम से अपने विस्तार के अभियान में लगी हुई थी !

रावण क्योंकि शिव का उपासक था और शैव संस्कृत का पोषक था ! अतः राम के विजय के उपरांत वैष्णव संस्कृत का जो प्रभाव समस्त भूमंडल पर पड़ा ! उसमें गुरुकुल में शैव साहित्य को पढ़ाना बंद कर दिया गया ! जिस कारण कालांतर में धीरे-धीरे रावण द्वारा रचित ग्रंथों का ह्रास होता चला गया ! क्योंकि उस समय संपूर्ण अध्ययन व्यवस्था श्रुति और स्मृति के आधार पर थी ! अत: पांडु लेखन नहीं किया जाता था !

बचे हुये स्व प्रेरणा से हस्तलिखित साहित्य को तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में संग्रहित करके सुरक्षित दिया गया ! किंतु वैष्णव शिक्षा पद्धति के प्रभाव में उन्हें कभी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया गया ! अतः नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों के जलाये जाने के बाद अधिकांश ग्रंथ उसमें जलकर नष्ट हो गये !

मुगलों के शासन काल के बाद अंग्रेजों का शासन काल आया ! जिस में भी अंग्रेजों ने भारतीय पांडुलिपियों को लूट कर अपने देश ले गये और वहां के संग्रहालय में आज भी वह पांडुलिपि या सुरक्षित हैं ! लेकिन उसमें कितनी पांडुलिपि रावण द्वारा रचित और संग्रहित है ! इसका कोई अलग से विस्तृत विवरण नहीं मिलता है !

किंतु इस सब के बाद भी बहुत सारा साहित्य अभी भी ऐसा है जो परंपरा के पोषक अपने पास सुरक्षित रखे हुये हैं ! जिनके विभिन्न संस्करण बाजार में समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं ! जिनका वर्णन में नीचे लेख में कर रहा हूं ! उससे पहले रावण के विषय में भी जानिये !

ब्रह्माजी के पुत्र पुलस्त्य ऋषि हुये ! उनका पुत्र विश्रवा हुआ ! विश्रवा की पहली पत्नी भारद्वाज की पुत्री देवांगना थी जिसका पुत्र कुबेर था ! विश्रवा की दूसरी पत्नी दैत्यराज सुमाली की पुत्री कैकसी थी जिसकी संतानें रावण ! कुंभकर्ण और विभीषण थीं ! जैन शास्त्रों में रावण को प्रति‍नारायण माना गया है ! जैन धर्म के 64 शलाका महापुरुषों में रावण की भी गिनती की जाती है !

रावण अपने युग का प्रकांड पंडित ही नहीं ! वैज्ञानिक भी था ! आयुर्वेद ! तंत्र और ज्योतिष के क्षेत्र में उसका योगदान महत्वपूर्ण है ! इंद्रजाल जैसी अथर्ववेदमूलक विद्या का रावण ने ही अनुसंधान किया ! उसके पास सुषेण जैसे वैद्य थे ! जो देश-विदेश में पाई जाने वाली जीवनरक्षक औषधियों की जानकारी स्थान ! गुण-धर्म आदि के अनुसार जानते थे ! रावण की आज्ञा से ही सुषेण वैद्य ने मूर्छित लक्ष्मण की जान बचाई थी !

रावण के बारे में वाल्मीकि रामायण के अलावा पद्मपुराण ! श्रीमद्भागवत पुराण ! कूर्मपुराण ! महाभारत ! आनंद रामायण ! दशावतारचरित आदि वैष्णव हिन्दू ग्रंथों के अलावा जैन ग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है ! जैन मत अनुसार रावण राक्षस नहीं बल्कि विद्याधर था जिसके कारण उसके पास जादुई शक्तियाँ थी !

रावण की सभा बौद्धिक संपदा के संरक्षण की केंद्र थी ! उस काल में जितने भी श्रेष्‍ठजन थे ! बुद्धिजीवी और कौशलकर्ता थे ! रावण ने उनको अपने आश्रय में रखा था ! रावण ने सीता के सामने अपना जो परिचय दिया ! वह उसके इसी वैभव का विवेचन है ! अरण्‍यकाण्‍ड का 48वां सर्ग इस प्रसंग में द्रष्‍टव्‍य है !

उस काल का श्रेष्‍ठ शिल्‍पी मय ! जिसने स्‍वयं को विश्‍वकर्मा भी कहा ! उसके दरबार में रहा ! उसकाल की श्रेष्‍ठ पुरियों में रावण की राजधानी लंका की गणना होती थी – यथेन्‍द्रस्‍यामरावती ! मय के साथ रावण ने वैवाहिक संबंध भी स्‍थापित किया ! मय को विमान रचना का भी ज्ञान था ! कुशल आयुर्वेदशास्‍त्री सुषेण उसके ही दरबार में था जो युद्धजन्‍य मूर्च्‍छा के उपचार में दक्ष था और भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली सभी ओषधियों को उनके गुणधर्म तथा उपलब्धि स्‍थान सहित जानता था ! शिशु रोग निवारण के लिए उसने पुख्‍ता प्रबंध किया था ! स्‍वयं इस विषय पर ग्रंथों का प्रणयन भी किया !

श्रेष्‍ठ वृक्षायुर्वेद शास्‍त्री उसके यहां थे जो समस्‍त कामनाओं को पूरी करने वाली पर्यावरण की जनक वाटिकाओं का संरक्षण करते थे – सर्वकाफलैर्वृक्षै: संकुलोद्यान भूषिता ! इस कार्य पर स्‍वयं उसने अपने पुत्र को तैनात किया था ! उसके यहां रत्‍न के रूप में श्रेष्‍ठ गुप्‍तचर ! श्रेष्‍ठ परामर्शद और कुलश संगीतज्ञ भी तैनात थे ! अंतपुर में सैकड़ों औरतें भी वाद्यों से स्‍नेह रखती थीं !

उसके यहां श्रेष्‍ठ सड़क प्रबंधन था और इस कार्य पर दक्ष लोग तैनात थे तथा हाथी ! घोड़े ! रथों के संचालन को नियमित करते थे ! वह प्रथमत: भोगों ! संसाधनों के संग्रह और उनके प्रबंधन पर ध्‍यान देता था ! इसी कारण नरवाहन कुबेर को कैलास की शरण लेनी पड़ी थी ! उसका पुष्‍पक नामक विमान रावण के अधिकार में था और इसी कारण वह वायु या आकाशमार्ग उसकी सत्‍ता में था : यस्‍य तत् पुष्‍पकं नाम विमानं कामगं शुभम् ! वीर्यावर्जितं भद्रे येन या‍मि विहायसम् !

उसने जल प्रबंधन पर पूरा ध्‍यान दिया ! वह जहां भी जाता ! नदियों के पानी को बांधने के उपक्रम में लगा रहता था : नद्यश्‍च स्तिमतोदका: ! भवन्ति यत्र तत्राहं तिष्‍ठामि चरामि च ! कैलास पर्वतोत्‍थान के उसके बल के प्रदर्शन का परिचायक है ! वह ‘माउंट लिफ्ट’ प्रणाली का कदाचित प्रथम उदाहरण है ! भारतीय मूर्तिकला में उसका यह स्‍वरूप बहुत लोकप्रिय रहा है ! नीतिज्ञ ऐसा कि राम ने लक्ष्‍मण को उसके पास नीति ग्रहण के लिए भेजा था ! विष्‍णुधर्मोत्‍तरपुराण में इसके संदर्भ विद्यमान हैं !”

शिव का परम भक्त ! यम और सूर्य तक को अपना प्रताप झेलने के लिए विवश कर देने वाला ! प्रकांड विद्वान रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ ! सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ बहु-विद्याओं का जानकार था ! उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल ! तंत्र ! सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था ! यह भी उल्लेख मिलता और कहा जाता है कि रावण ने कई शास्त्रों की रचना की थी ! आओ जानते हैं कि वे कौन कौन से शास्त्र थे !

रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की ! रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले जाने लगा ! तो भगवान शिव ने अपने अंगूठे से तनिक-सा जो दबाया तो कैलाश पर्वत फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया ! इससे रावण का हाथ दब गया और वह क्षमा करते हुये कहने लगा- ‘शंकर-शंकर’- अर्थात क्षमा करिए ! क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया ! यह क्षमा याचना और स्तुति ही कालांतर में ‘शिव तांडव स्तोत्र’ कहलाया !

अरुण संहिता : संस्कृत के इस मूल ग्रंथ का अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है ! मान्यता है कि इस का ज्ञान सूर्य के सार्थी अरुण ने लंकाधिपति रावण को दिया था ! यह ग्रंथ जन्म कुण्डली ! हस्त रेखा तथा सामुद्रिक शास्त्र का मिश्रण है !

रावण संहित जहां रावण के संपूर्ण जीवन के बारे में बताती है वहीं इसमें ज्योतिष की बेहतर जानकारियों का भंडार है !

चिकित्सा और तंत्र के क्षेत्र में रावण के यह ग्रंथ चर्चित हैं- 1. दस शतकात्मक अर्कप्रकाश ! 2. दस पटलात्मक उड्डीशतंत्र 3. कुमारतंत्र और 4. नाड़ी परीक्षा !

रावण के यह चारों ग्रंथ अद्भुत जानकारी से भरे हैं ! रावण ने अंगूठे के मूल में चलने वाली धमनी को जीवन नाड़ी बताया है ! जो सर्वांग-स्थिति व सुख-दु:ख को बताती है ! रावण के अनुसार औरतों में वाम हाथ एवं पांव तथा पुरुषों में दक्षिण हाथ एवं पांव की नाड़ियों का परीक्षण करना चाहियह !

अन्य ग्रंथ : ऐसा कहते हैं कि रावण ने ही अंक प्रकाश ! इंद्रजाल ! कुमारतंत्र ! प्राकृत कामधेनु ! प्राकृत लंकेश्वर ! ऋग्वेद भाष्य ! रावणीयम ! नाड़ी परीक्षा आदि पुस्तकों की रचना की थी !

इसी प्रकार शिशु-स्वास्थ्य योजना का विचारक ‘अर्कप्रकाश’ को रावण ने मंदोदरी के प्रश्नों के उत्तर के रूप में लिखा है ! इसमें गर्भस्थ शिशु को कष्ट ! रोग ! काल ! राक्षस आदि व्याधियों से मुक्त रखने के उपाय बताये गये हैं !

‘कुमारतंत्र’ में मातृकाओं को पूजा आदि देकर घर-परिवार को स्वस्थ रखने का वर्णन है ! इसमें चेचक ! छोटी माता ! बड़ी माता जैसी मातृ व्याधियों के लक्षण व बचाव के उपाय बताये गये हैं !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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