लुटेरों को भारत का रास्ता बौद्ध अनुयायियों ने दिखलाया था : Yogesh Mishra

कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र और शंकराचार्य जैसे धर्म योद्धा ने जब भारत से बौद्ध धर्म उखाड़ कर फेक दिया और सनातन धर्म की पुनः स्थापना कर दी ! तब बौखलाये बौद्ध धर्म अनुयायियों ने भारत में सनातन धर्म की बरबादी के लिये लुटेरे और डकैतों का सहारा लिया !

ईसा सन् 7वीं सदी तक उस समय गांधार के अनेक भागों में बौद्ध धर्म काफी उन्नत था ! तक्षशिला से सनातन धर्मी ब्राह्मणों को खदेड़ दिया गया था और उनकी जगह अन्य वर्ण के लोगों को बौद्ध धर्म की दीक्षा देकर तक्षशिला पर उनका कब्जा करवा दिया गया था ! ज्ञान की विकृति के साथ-साथ अब तक्षशिला में ज्ञान देने के लिये बड़े-बड़े विद्वानों ने आना बंद कर दिया था ! राजाओं के सहयोग से तक्षशिला में ज्ञान के नाम पर रह रहे बौद्ध धर्म के अनुयायी अब ज्ञान में कम और अय्याशी में ज्यादा लग गये थे ! दूसरे शब्दों में कहा जाये तो तक्षशिला बौद्ध धर्मों के नेतृत्व में अय्याशी का अड्डा बन गया था !

लगभग उसी समय 632 ई. में हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात (मृत्यु) के बाद 6 वर्षों के अंदर ही उनके उत्तराधिकारियों ने सीरिया ! मिस्र ! उत्तरी अफ्रीका ! स्पेन एवं ईरान को युद्ध में जीत लिया ! इस समय खलीफा साम्राज्य फ्रांस के लायर नामक स्थान से लेकर आक्सस एवं काबुल नदी तक फैल गया था !

वफात के बाद ‘खिलाफत’ संस्था का गठन हुआ ! जो इस बात का निर्णय करती थी कि इस्लाम का उत्तराधिकारी कौन है ? हज. मुहम्मद स.अ.व के दोस्त अबू बकर को उनका उत्तराधिकारी घोषित किया गया ! पहले 4 खलीफाओं ने हज. मुहम्मद साहब से अपने रिश्तों के कारण खिलाफत हासिल की ! उनमें से उमय्यदों और अब्बासियों के काल में इस्लाम का विस्तार हुआ ! अब्बासियों ने ईरान और अफगानिस्तान में अपनी सत्ता कायम की ! ईरान के पारसियों को या तो इस्लाम ग्रहण करना पड़ा या फिर वह भागकर सिन्ध में आ गये ! जब सिन्ध में भी आक्रमण बढ़ने लगे तो वह ईरानी पारसी गुजरात में आकर बस गये !

7वीं सदी के बाद अब तक्षशिला पर अरब और तुर्क के मुसलमानों ने आक्रमण करना शुरू कर दिया ! सालों तक हिन्दुओं की उनसे लड़ाइयां चलीं और कुछ इतिहासकारों के अनुसार 870 ई. में अरब सेनापति याकूब एलेस ने बौद्धों की गद्दारी के कारण अफगानिस्तान को अपने अधिकार में कर लिया ! इसके बाद यहां के हिन्दू और बौद्धों का जबरन धर्मांतरण अभियान शुरू ‍हुआ और अंत में काफिरिस्तान को छोड़कर सारे अफगानी लोग मुसलमान बन गये !

7वीं सदी के बाद अफगानिस्तान और वर्तमान पाकिस्तान भी भारत के हाथ से जाते रहे ! भारत में इस्लामिक शासन का विस्तार 7वीं शताब्दी के अंत में मोहम्मद बिन कासिम के सिन्ध पर आक्रमण और बाद के मुस्लिम शासकों द्वारा हुआ ! जिसमें हिन्दुओं के विनाश के लिये बौद्धों ने खुल कर मुसलमानों का साथ दिया ! लगभग 712 में इराकी शासक अल हज्जाज के भतीजे एवं दामाद मुहम्मद बिन कासिम ने 17 वर्ष की अवस्था में सिन्ध और बलूच के अभियान का सफल नेतृत्व किया !

इस्लामिक खलीफाओं ने सिन्ध फतह के लिए कई अभियान चलाये ! 10 हजार सैनिकों का एक दल ऊंट-घोड़ों के साथ सिन्ध पर आक्रमण करने के लिए भेजा गया ! सिन्ध पर ईस्वी सन् 638 से 711 ई. तक के 74 वर्षों के काल में 9 खलीफाओं ने 15 बार आक्रमण किया ! 15वें आक्रमण का नेतृत्व मोहम्मद बिन कासिम ने किया !

मुहम्मद बिन कासिम के बाद महमूद गजनवी और उसके बाद मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण कर अंधाधुंध कत्लेआम और लूटपाट मचाया ! तब तक बौद्ध मठ शक्ति में क्षीण हो चुके थे ! इस दौरान मुसलमानों ने हिन्दू मंदिरों ! बौद्ध मठों और स्तूपों का विध्वंस किया ! 7वीं शती ईस्वी के तृतीय दशक में चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत आया था तो उसने तक्षशिला को उजड़ा पाया था !

मुहम्मद बिन कासिम अत्यंत ही क्रूर था ! सिन्ध के दीवान गुन्दुमल की बेटी ने सर कटवाना स्वीकार किया ! पर मीर कासिम की पत्नी बनना स्वीकार नहीं किया ! इसी तरह वहां के राजा दाहिर (679 ईस्वी में राजा बने) और उनकी पत्नियों और पुत्रियों ने भी अपनी मातृभूमि और अस्मिता की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी ! सिन्ध देश के सभी राजाओं की कहानियां बहुत ही मार्मिक और दुखदायी हैं ! आज सिन्ध देश पाकिस्तान का एक प्रांत बनकर रह गया है ! कहते हैं कि राजा दाहिर अकेले ही अरब और ईरान के दरिंदों से लड़ते रहे ! उनका साथ किसी ने नहीं दिया बल्कि कुछ बौद्ध लोगों ने थोड़े से धन के लालच में उनके साथ गद्दारी ही की !

हजरत मुहम्मद अलैहिस्सलाम के समय बौद्ध पश्चिम एशिया में फैल चुका था इसलिए वहां के अरबी भाषी लोगों ने ‘बुद्ध पूजा’ को गलत उच्चारण के कारण ‘बुतपरस्ती’ कहकर उसका विरोध किया जिसके चलते अरब के इस्लामिक हमलावर जहां भी गये ! उन्होंने बुद्ध मूर्तियों को तोड़ डाला ! विजेताओं ने अफगानिस्तान से लेकर मध्य एशिया तक फैले बौद्ध धर्म को समूल नष्ट कर दिया !

राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर अपनी बहुचर्चित पुस्‍तक ‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय’ में लिखते हैं कि इस्‍लाम में बुतपरस्‍ती (मूर्ति पूजा) का विरोध है और शायद यह ‘बुत’ शब्‍द ‘बुद्ध’ का ही अपभ्रंश है !

भारत में भी जब इस्लामिक खलीफाओं ने आक्रमण किया तो बौद्ध मठ ! बौद्ध शिक्षा के केंद्र व हिन्दू मंदिर ही पहले-पहल उनके निशाने पर आये ! पीएच चोपड़ा ! बीएन पुरी व एमएन दास ने अपनी ‘भारत का सामाजिक ! सांस्‍कृतिक और आर्थिक इतिहास’ के पहले खंड में लिखा है कि नालंदा, विक्रमशिला, सोनापुरी व जगदल सबके सब महान बौद्ध विद्यापीठ थे ! जहां से बौद्ध विद्वान तैयार होकर पूरी दुनिया में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने जाते थे !

गौरतलब है कि पहले विदेशी आक्रांताओं ने बामियान, पुरुषपुर (पेशावर), कराची, चंडीगढ़, श्रीनगर, सोमनाथ, मथुरा, काशी, अयोध्या, प्रयाग, लुम्बिनी, दिल्ली (इंद्रप्रस्थ), मेरठ (हस्तिनापुर), बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, सांची, पाटलीपुत्र, नालंदा, पंचानेर, पावागढ़, कौशाम्बी, लखनऊ (लक्ष्मणपुर), नासिक, आगरा (अंगिरा), राजगिरि, भोपाल (भोजपाल), उज्जैन (अवंतिका), रामेश्वरम, कोलकाता, ढाका, त्रिपुरा आदि महत्वपूर्ण हिन्दू, जैन और बौद्ध स्थानों पर आक्रमण करके यहां के प्रमुख मंदिरों, मठों, महलों और शिक्षा केंद्रों को ही नष्ट नहीं किया, बल्कि धर्मग्रंथों की पांडुलिपियों को ढूंढ-ढूंढकर जलाया गया, इन तुर्क आक्रमणकर्ताओं में गजनवी, तैमूरलंग, औरंगजेब, मोहम्मद गौरी, बाबर, बख्तियार खिलजी के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं !

7वीं सदी के प्रारंभ तक तक्षशिला, वल्लभी, धार, उज्जैन तथा वैशाली में प्राचीन विश्वविद्यालय विद्यमान थे ! उन विश्वविद्यालयों में ज्ञान, विज्ञान और धर्म की लाखों पुस्तकें विद्यमान थीं !

12वीं शताब्‍दी में पाल शासन की समाप्ति के बाद बौद्ध धर्म से राजकीय संरक्षण छिन गया ! इसके बाद मुसलमान सेनापति बख्तियार खिलजी ने चुन-चुनकर सभी बौद्ध मठों को नष्‍ट कर दिया ! नालंदा जैसा विश्‍वप्रसिद्ध विश्‍वविद्यालय उसी ने नष्‍ट किया था ! यही नहीं ! नालंदा में स्थित सभी बौद्ध साहित्‍य को उसने आग के हवाले कर दिया था !

इस्लामिक चरमपंथियों ने भारत में चुन-चुनकर हिन्दुओं के प्रमुख मंदिरों, बौद्ध स्तूपों, मठों और विद्यालयों को निशाना बनाया ! आज भी तक्षशिला, दिल्ली, नालंदा, सांची, मथुरा आदि जगहों पर दिखाई देने वाले भग्नावशेष और खंडहर इस बात का सबूत हैं ! यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बौद्ध धर्म को मिटाकर ही इस्‍लाम का अभ्‍युदय हुआ ! इस्‍लाम के अभ्‍युदय से बहुत पहले बौद्ध धर्म अरब में पहुंच चुका था और जगह-जगह बुद्ध की मूर्ति की पूजा या उसके समक्ष ध्यान किया जाता था ! पर वहाँ पर आज मुसलमानों का कब्ज़ा है !

तक्षशिला के बाद नालंदा विश्वविद्यालय की चर्चा होती है ! बिहार की राजधानी पटना से करीब 120 किलोमीटर दक्षिण-उत्तर प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं ! इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त काल के दौरान 5वीं सदी में हुई थी ! लेकिन 1193 में एक इस्लामिक आक्रांता ने इसे नेस्तनाबूद कर दिया !

पश्चिमी पाकिस्तान में प्रसिद्ध नगर है जिसे बौद्धकाल में ‘पुरुषपुर’ कहा जाता था ! यहां सबसे बड़े और ऊंचे स्तूप के नीचे से बुद्ध भगवान की अस्थियां खुदाई में निकाली गई थीं ! इतिहास में दर्ज है कि यह स्तूप सम्राट कनिष्क ने बनवाया था जिसे इस्लामिक आक्रांताओं ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था ! आज भी उसके खंडहर हैं !

अफगानिस्तान में बामियान क्षेत्र बौद्ध धर्म प्रचार का प्रमुख केंद्र था ! इसे बौद्ध धर्म की राजधानी माना जाता था ! बौद्ध काल में हिन्दूकुश पर्वत से लेकर कंदहार तक अनेक स्तूप थे जिन्हें इस्लामिक आक्रांताओं ने नष्ट कर दिया ! यहां बौद्ध धर्म से संबंधित अनेक गुफाएं हैं ! जहां भगवान बुद्ध की विशालकाय मूर्तियां आज भी विद्यमान हैं ! तालिबानियों ने इन मूर्तियों को तोप से तोड़कर खंडित कर दिया था !

वैशाली गंगा घाटी का नगर है ! जो आज के बिहार एवं बंगाल प्रांत के बीच स्थित है ! वैशाली नगर की स्थापना इक्ष्वाकु वंश के राजा विशाल ने की थी इसलिए इसे ‘विशाला’ कहा जाता था जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है ! बाद में इसे वैशाली कहा जाने लगा ! प्राचीन नगर वैशाली के भग्नावशेष वर्तमान बसाढ़ नामक स्थान के निकट स्थित हैं ! जो मुजफ्फरपुर से 20 मील दक्षिण-पश्चिम की ओर है !

इसी स्थान पर अशोक ने एक प्रस्तर स्तंभ स्थापित किया था ! यहां पर बौद्ध धर्म के प्रमुख चैत्यगृह थे ! बुद्ध को यह स्थान बड़ा ही प्रिय था ! जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी का जन्म इसी नगरी में हुआ था अत: वह लोग इस पुरी को ‘महावीर-जननी’ कहते थे !

प्राचीनकाल में कश्मीर बौद्ध धर्म का पालनहार रहा है ! यहां से होकर गये सिल्क रूट से ही बौद्ध धर्म के अनुयायी और भिक्षु चीन ! तिब्बत और दूसरी ओर मध्य एशिया में आया-जाता करते थे ! चतुर्थ बौद्ध संगीति कश्मीर में हुई थी ! प्रथम बौद्ध संगीति 483 ईपू राजगृह में द्वितीय बौद्ध संगीति वैशाली में तृतीय बौद्ध संगीति 249 ईपू को पाटलीपुत्र में हुई थी ! जहाँ पर आज मुसलमानों का कब्ज़ा है !

चतुर्थ और अंतिम बौद्ध संगीति कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल (लगभग 120-144 ईपू) में हुई ! यह संगीति कश्मीर के ‘कुंडल वन’ में आयोजित की गई थी ! इस संगीति में 500 बौद्ध विद्वानों ने भाग लिया और त्रिपिटक का पुन: संकलन व संस्करण हुआ !

कश्मीर के बारामूला, गुलमर्ग, परिहास पोरा, हार वन, कानिसपोरा-उशकुरा में बौद्ध मठों के खंडहर आज भी मौजूद है ! इन स्थानों का ऐतिहासिक महत्व है और विश्व में फैले बौद्ध समुदाय का इनसे लगाव है ! बौद्ध मठ परिहास पोर कस्बे में है ! जो श्रीनगर से मात्र 26 किलोमीटर की दूरी पर है ! पर यहाँ पर आज मुसलमानों का कब्ज़ा है !

कुमारगुप्त ने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी ! बौद्ध विश्वविद्यालय नालंदा को देश का प्राचीनतम विश्वविद्यालय माना जाता है ! यह पटना के निकट है ! भगवान बुद्ध अपने जीवन में कई बार नालंदा आये थे ! यह स्थान न केवल ज्ञान बल्कि विभिन्न कलाओं का केंद्र भी रहा है !

यहां एक ओर बौद्ध विहारों की कतार है तो दूसरी ओर छोटे स्तूपों से घिरे कुछ मंदिर हैं ! नालंदा में पुरातत्व संग्रहालय में भी बौद्ध धर्म के देवी-देवता तथा भगवान बुद्ध की प्रतिमा अत्यंत दर्शनीय है ! इनके अलावा भागलपुर के निकट विक्रमशिला के अवशेष ! फर्रुखाबाद जिले में काली नदी के तट पर प्राचीन संकाश्य के स्मारक ! लखनऊ से 134 किमी दूर श्रावस्ती के स्तूप एवं विहारों के खंडहर तथा इलाहाबाद से 54 किमी दूर प्राचीन शहर कौशांबी के अवशेष भी बौद्ध धर्मस्थलों की यात्रा पर निकले सैलानियों को आकर्षित करते हैं !

इस तरह भारत से सत्य सनातन हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना से बौखलाये हुये बौद्ध धर्मियों ने शुरुआत में तो हिंदुत्व को नष्ट करने के लिये मुगलों का साथ दिया ! किंतु जब मुग़ल सशक्त हो गये और बौद्ध धर्म कमजोर पड़ गया ! तब मुगलों ने भारत में मात्र हिंदू धर्म ही नहीं बल्कि बौद्ध धर्म को भी नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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