शिवलिंग उर्ध्वगामी बेलनाकार क्यों होता है : Yogesh Mishra

सावन में रुद्राभिषेक क्यों अवश्य करना चाहिये

वर्तमान भौतिक वैज्ञानिक कहते है कि आज से लगभग 13.7 खरब वर्ष पूर्व एक अत्यंत गर्म और घनी अवस्था से ब्रह्मांड का जन्म हुआ ! उनके अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति किसी एक बिंदु से हुई थी ! जिसमें ऊर्जा का अनंत प्रवाह हुआ था !

शास्त्रों में इसी घटना को ब्रह्म तत्व में ब्रह्म ऊर्जा के प्रवेश की संज्ञा का नाम दिया गया है ! शास्त्र बतलाते हैं कि जब ब्रह्म तत्व जो की सुई की नोक के एक करोड़वें अंश से भी छोटा था ! उसमें ब्रह्म ऊर्जा का प्रवेश हुआ तो ब्रह्म तत्व विस्तार लेने लगा और अंततः अत्यधिक विस्तार ले लेने के कारण ब्रह्म तत्व में एक विस्फोट हुआ ! जिससे समस्त ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है !

ब्रह्म तत्व का यह विस्फोट ब्रह्म ऊर्जा के समागम से आज भी निरंतर जारी है अर्थात कहने का तात्पर्य है कि ब्रह्मांड में जहां कहीं जो भी कुछ है, वह सब ब्रह्म तत्व और ब्रह्म ऊर्जा से ही उत्पन्न हुआ है ! इसीलिए आज भी ब्रह्मांड निरंतर विस्तार देता चला जा रहा है ! इस ब्रह्म तत्व और ब्रह्म ऊर्जा का यह स्वरूप लंबवत उर्ध्वगामी बेलनाकार है ! इसी से मनीषियों ने शिवलिंग की कल्पना की है !

विज्ञान की दृष्टि में यह महाविस्फोट मात्र 1.43 सेकंड के अंतराल में हुआ था ! उसी के बाद ग्रह, नक्षत्र, तारा समूह, अंतरिक्ष आदि अस्तित्व में आये, जो आज भी वर्तमान में अस्तित्व में हैं और इनमें निरंतर विस्तार हो रहा है !

भौतिक शास्त्र के अनुसार 1.34वें सेकेंड में ब्रह्मांड 1030 गुणा फैल चुका था ! जिसमें शुरुआत से ही हाइड्रोजन, हीलियम आदि का अस्तित्व स्थापित हो गया था ! इससे ही अन्य भौतिक तत्व (आकाश,वायु,अग्नि,जल,पृथ्वी) आदि का निर्माण हुआ है ! जो आज अध्यात्म और वेदांत के दर्शन का आधार है !

भगवान शिव की पहली प्रयोगशाला कैलाश पर्वत पर इसी शिवलिंग आकार में न्यूक्लिअर रिएक्टर के रूप में स्थापित की गई थी ! वह समय श्रावण मास की अमावस्या का दिन था ! जहां पर ब्रह्म तत्वों की ऊर्जा से शैवों की वैष्णव लोगों से रक्षा के लिए घातक मारक अस्त्र शस्त्रों का निर्माण आरम्भ किया गया था ! जिन्हें हम पाशुपत, पिनाक, अमोघ चक्र, त्रिशुल,  चक्र भवरेंदु आदि दिव्य शास्त्रों के नाम से जानते हैं !

दरअसल शिव के इस न्यूक्लिअर रिएक्टर प्रयोगशाला को ठंडा रखने के लिये कैलाश मानसरोबर के जल का निरंतर प्रयोग किया जाता था ! जिससे वह ठंडा और शांत रहे ! विज्ञान इतना उन्नत था कि इस न्यूक्लिअर रिएक्टर प्रयोगशाला में प्रयोग किया गया जल दूषित नहीं होता था !

इसलिये आज भी कैलाश पर्वत अन्दर से सात लेयर में खोखला है ! जिस पर आज तक कोई भी पर्वतारोही नहीं चढ़ पाया जबकि उससे ऊँचा माउन्ट एवरेस्ट पर्वत पर पर्वतारोहियों ने फराह हासिल कर ली है !

इस रहस्य को होमी जहांगीर भाभा जानते थे ! इसीलिये 6 जनवरी सन् 1954 को भारत के प्रथम परमाणु ऊर्जा आयोग के द्वारा स्थापित परमाणु उर्जा संस्थान का आकर होमी जहांगीर भाभा ने शिव लिंग की आकृति का बनाने का निर्णय लिया ! जोकि आज भी भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (मुंबई) के नाम से विख्यात है !

इस रिएक्टर की संरचना भी शिव लिंग की तरह उर्ध्वगामी बेलनाकार ही है ! लेकिन तकनीकी के अभाव में इस न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा रखने के लिये जो जल का इस्तेमाल किया जाता है ! उसे किसी अन्य प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है  !

देश में, ज्यादातर शिवलिंग वहीं पाए जाते हैं जहां जल का भंडार हो, जैसे नदी, तालाब, झील इत्यादि ! विश्व के सारे न्यूक्लियर प्लांट भी पानी (समुद्र) के पास ही हैं !

शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती है ! जहां से जल निष्कासित हो रहा है, उसको लांघा भी नहीं जाता है !

ऐसी मान्यता है की वह जल आवेशित (चार्ज) होता है ! उसी तरह से जिस तरह से न्यूक्लियर रिएक्टर से निकले हुए जल को भी दूर ऱखा जाता है !

भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा लीजिये तो आप हैरान हो जायेंगे कि भारत सरकार के नुक्लिएर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योत्रिलिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है !

महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं !

क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता ! भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है ! शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिल कर औषधि का रूप ले लेता है !

ऐसी मान्यता है कि वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की ही आकृति है ! जो कि हमारे मध्य मस्तिष्क में स्थपित है ! जो लगातार शरीर को जीवनी ऊर्जा देता रहता है !

जो शिवलिंग (ब्रह्मांड) की ऊर्जा से रिचार्ज होता है ! वही एक मात्र जीवनी ऊर्जा का स्रोत है ! जिससे लगातार जीवनी ऊर्जा निकलती रहती है !

इस तरह निश्चित सामग्री और मन्त्रों के कम्पन के साथ रुद्राभिषेक करने से व्यक्ति के जीवनी ऊर्जा में विस्तार होता है !

इस तरह सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि श्रावण मास में रुद्र अभिषेक द्वारा व्यक्ति ब्रह्मांड की शैव ऊर्जा से सीधे संपर्क स्थापित कर लेता है ! जिसका लाभ उसे वर्ष भर प्राप्त होता है ! इसलिए प्रतिवर्ष श्रावण मास में रुद्राभिषेक अवश्य करना चाहिए !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

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www.sanatangyanpeeth.in

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