एक ही जन्म में लाखों जन्मों को कैसे जियें
हमने शास्त्रों में पढ़ा है कि हमारे ऋषि-मुनि, राक्षस-दैत्य, एक जीवन में ही हजारों साल की तपस्या कर लेते थे यह कैसे संभव था, इस विज्ञान पर आज चर्चा करेंगे !
एक परिपक्व साधक एक ही जन्म में कई जन्मों की यात्रा कैसे कर लेता है ! यह केवल एक काव्यात्मक विचार नहीं है, बल्कि चेतना के विकास का एक अत्यंत गहरा और प्रामाणिक विज्ञान है।
जब कोई व्यक्ति अपने जन्म जन्मान्तर के वृत्तिगत विचार को त्याग कर उच्चतम क्षमता को जाग्रत करने का संकल्प लेता है, तब वह तप के समर्थ से समय और अनुभव की सामान्य गति पूरी तरह से बदल देता है।
आइए इस गहरे सिद्धांत को अध्यात्म और आधुनिक विज्ञानकी दृष्टि से समझते हैं, विशेषकर न्यूरोबायोलॉजी और मनोविज्ञान, दोनों ही दृष्टियों से समझते हैं:
सामान्यतः एक व्यक्ति प्रतिक्रियात्मक जीवन जीता है, जिससे वह लगातार नए कर्म और संस्कार बनाता रहता है। इन संचित कर्मों को भोगने और सुलझाने के लिये उसे कई जन्म लेने पड़ते हैं।
जबकि एक परिपक्व साधक गहन ध्यान और प्रज्ञा बोध के माध्यम से ‘सचेतन’ जीवन जीता है, जो उस साधक का जीवन साक्षी स्वरूपा होता है। जिसमें कार्मिक सम्बन्ध पैदा नहीं होते हैं ! जिससे कई जन्मों की व्यथा प्रगट ही नहीं होती है और पूर्व के जन्मों की व्यथा समाप्त हो जाती है !
इसी तरह अध्यात्म में सांसारिक समय एक भ्रम है। चेतना की यात्रा रैखिक नहीं है। जब साधक वर्तमान क्षण में पूरी तरह स्थापित हो जाता है, तब शिव की कृपा से साधक पूर्ण एकाग्रता से सदियों का ज्ञान और बोध स्वयं में एक ही क्षण में समाहित कर लेता है।
विज्ञान भी इस आध्यात्मिक घटना के मस्तिष्क कार्यप्रणाली को अब स्वीकारने लगा है !
विज्ञान कहता है कि हमारे मस्तिष्क का रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम यह तय करता है कि हम दुनिया भर की सूचनाओं में से किस पर ध्यान दें और किसे छोड़ दें । एक सामान्य व्यक्ति का RAS प्रणाली स्वयं को जीवित रखने और सामान्य सांसारिक उलझनों को निपटने के लिए प्रोग्राम होती है।
परंतु, एक परिपक्व साधक अपने लक्ष्य और आत्म-बोध के प्रति अपनी उच्च मानसिक एकाग्रता को चरम पर ले जा कर अपने RAS द्वारा केवल उसी जानकारी को ग्रहण करता है, जो उसके उच्चतर विकास में सहायक हैं।
इस अविश्वसनीय फोकस के कारण उसके सीखने, समझने और बदलने की गति कई गुना बढ़ जाती है। जिससे वह साधक सामान्य व्यक्ति से बेहतर समय का सदुपयोग कर पाता है और कई जन्मों की अनुभूति इसी जन्म में प्राप्त कर लेता है !
विज्ञान भी अब यह मानने लगा है कि मस्तिष्क कभी बुढ़ा नहीं होता है ! हमारा मस्तिष्क जीवन भर नए न्यूरल कनेक्शन बना सकता है। सामान्य लोग बाहरी परिस्थितियों की ठोकर से धीरे-धीरे सीखते और बदलते हैं।
जबकि इसके विपरीत, एक साधक सचेतन अभ्यास से अपने मस्तिष्क के तारों को स्वेच्छा से और तेजी से विकसित कर लेता है। वह कुछ ही महीनों या वर्षों में उन गहरी आदतों और वृत्तियों को मिटा देता है, जिन्हें बदलने में सामान्य व्यक्ति को कई सदियां लग जाती हैं।
मनोविज्ञान में एक प्रतिमान विस्थापन कहलात है। जब एक साधक अपने भीतर गहराई में उतरता है, तो कई बार एक ही विचार या बोध उसके पूरे जीवन का दृष्टिकोण हमेशा के लिए बदल देता है। यही बुद्धत्व की प्राप्ति है !
जो समझ या परिपक्वता सामान्य व्यक्ति को दशकों के बाहरी संघर्ष के बाद आती है, वह एक योग्य गुरु के सानिध्य में एक गहरी कार्य कारण की ईश्वरीय स्पष्टता क्षण भर में घट जाती है।
अत: यह सिद्धांत इस तथ्य पर आधारित है कि मानव विकास की गति ‘समय’ पर नहीं, बल्कि ‘ध्यान की तीव्रता, गहनता और एकाग्रता’ पर निर्भर है। इस तरह उच्चकोटि की चेतना एक ही जीवन में मनोविज्ञान, न्यूरोबायोलॉजी और आध्यात्मिक बोध एक साथ प्राप्त कर लेती है, जिसे एक ही जीवन में कई युगों की यात्रा कहा जाता है।
बस आवश्यकता है सही गुरु के सानिध्य की !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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मोबाईल : 9453092553
