जीवन में आलोचक की उपयोगिता

यदि आप अपने जीवन में विकसित होना चाहते हैं तो आपका जीवन आलोचकों से भरा हुआ होना चाहिए !

आपके आलोचक ही आपके सबसे बड़े मार्गदर्शक और शुभचिंतक हैं !

आपका आलोचक कभी भी आपको आपके लक्ष्य से भटकने नहीं देता है ! वह आपके हर गलती पर चीख चीख कर बतलाता है कि आप गलती कर रहे हैं !

इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा कि आपको बिना किसी अतिरिक्त व्यय के सदैव कोई व्यक्ति पिता की तरह याद दिलाता रहता है कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है और आप कहां गलती कर रहे हैं ?

इसलिए आलोचकों से कभी भी नफरत नहीं करनी चाहिए आलोचक प्रकृति की व्यवस्था का अंश हैं !

आप अपने जीवन में जितनी प्रगति करेंगे, आपके आलोचकों की संख्या उतनी तेजी से बढ़ेगी अर्थात आपके आलोचकों की बढ़ती हुई संख्या ही यह बतलायेगी कि अपने अपने प्रतिभा का अपने जीवन में पर्याप्त प्रगति के लिये प्रयोग किया है या नहीं !

अगर आपके आलोचकों की संख्या पर्याप्त नहीं है तो इसका स्पष्ट तात्पर्य है कि आपने अपने जीवन में अपनी प्रतिभा का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं किया है !

इसीलिये  कबीर दास जैसे महान संत ने कहा है कि निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय !!

किंतु दुर्भाग्य भारत का यह रहा है कि भारत ने जब पश्चिम के बाजारवाद को स्वीकार किया तो उसके साथ अपने आलोचकों को नष्ट करने की पश्चिम की रणनीति को भी स्वीकार कर लिया !

यह गलती भारत के व्यक्तित्व निर्माण में सबसे बड़ी गलती थी ! इसी वजह से आज समाज बाजारवाद के प्रभाव में ठहर गया है !

इसी का परिणाम है कि आज भारत में कबीर दास, रहीम दास, रैदास, तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, तुकाराम जैसे महान विचारक पैदा नहीं हो रहे हैं !

यह मेरा अपना निजी मत है कि अगर भारत को विकसित करना है, तो भारत में आलोचकों के दमन की नीति को छोड़ना होगा ! फिर वह चाहे उद्योग जगत हो या राजनीति,  हर जगह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के लिए आलोचकों का होना अनिवार्य है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

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www.sanatangyanpeeth.in

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