औषधि विज्ञान और चिकित्सा अनुसंधान का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी और ठंडे देशों में विकसित हुआ है। जब इन्हीं खोजों और दवाओं को भारत जैसे उष्णकटिबंधीय और गर्म देश में बिना किसी बदलाव के लागू किया जाता है, तो कई चिकित्सीय विसंगतियां सामने आती हैं।
ठंडे जलवायु में रहने वाले लोगों की बेसल मेटाबोलिक रेट आमतौर पर उच्च होती है ताकि शरीर का आंतरिक तापमान बना रहे, और उनके शरीर में दवाइयों को मेटाबोलाइज करने वाले लिवर एंजाइमों की कार्यप्रणाली ठंडे वातावरण के अनुकूल होती है।
इसके विपरीत, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की चयापचय दर और शरीर का आंतरिक वातावरण अलग होता है, जहाँ अत्यधिक गर्मी के कारण पसीना और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बदलता रहता है। ऐसे में पश्चिमी देशों द्वारा निर्धारित दवा की खुराक भारतीय शरीर के लिए या तो बहुत अधिक साबित होती है या समय से पहले विघटित हो जाती है।
दवा शरीर में कैसे पचती है और उसका असर कितनी देर रहता है, यह पर्यावरण पर बहुत अधिक निर्भर करता है। गर्म जलवायु में शरीर को ठंडा रखने के लिए त्वचा की सतह के पास रक्त वाहिकाएं चौड़ी हो जाती हैं, जबकि ठंडे देशों में वे सिकुड़ी रहती हैं।
जब कोई ट्रांसडर्मल पैच या ओरल दवा गर्म देश में उपयोग की जाती है, तो बढ़े हुए रक्त संचार और उच्च तापमान के कारण दवा का अवशोषण अत्यधिक तीव्र हो जाता है, जिससे जो दवा धीरे-धीरे असर करनी चाहिए थी, वह अचानक रक्त में खुलकर ओवरडोज का खतरा पैदा कर सकती है।
इसके अलावा, भारत जैसे गर्म देश में पारंपरिक आहार, मसालों का उपयोग और मौसम का प्रभाव आंतों के माइक्रोबायोम को ठंडे देशों के नागरिकों से बिल्कुल अलग बनाता है। पश्चिमी देशों के माइक्रोबायोम के आधार पर बनाई गई एंटीबायोटिक्स या अन्य ओरल दवाएं भारतीय शरीर में या तो पूरी तरह अप्रभावी हो जाती हैं या गंभीर गैस्ट्रिक दुष्प्रभाव दिखाती हैं।
औषधि अनुसंधान मुख्य रूप से श्वेत यूरोपीय आबादी के क्लिनिकल ट्रायल पर आधारित होता है, जबकि विभिन्न नस्लों में आनुवंशिक बनावट अलग होती है।
भारत में आनुवंशिक विविधता के कारण कई लोगों में दवा को प्रोसेस करने वाले एंजाइमों की भिन्नता होती है, और पश्चिमी देशों की मानकीकृत दवाएं अक्सर इस भिन्नता को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती हैं, जिसके कारण दवाएं साइड इफेक्ट्स का रूप ले लेती हैं।
इसके अतिरिक्त, ठंडे देशों में मुख्य रूप से पुरानी और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां प्रमुख होती हैं, जबकि भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देशों में मौसमी संक्रमण और वेक्टर जनित रोग आम हैं।
जब ठंडे देशों की तर्ज पर बनी दवाएं यहां दी जाती हैं, तो वह स्थानीय रोगजनकों के खिलाफ वह प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं कर पातीं या शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को भ्रमित कर देती हैं।
चिकित्सा विज्ञान इस बात को अब स्वीकार कर रहा है कि वन-साइज़-फिट्स-ऑल का सिद्धांत फार्माकोलॉजी में काम नहीं कर सकता, और भारत जैसे गर्म देश में औषधियों का अनुसंधान, उनकी खुराक और उपचार के तौर-तरीके स्थानीय जलवायु और भारतीय शरीर-प्रकृति के अनुकूल ही होने चाहिए।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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