नीलकंठ होने का अर्थ है कि जब जीवन के समुद्र-मंथन से अपमान, विश्वासघात, निंदा या प्रतिकूलता का हलाहल (विष) निकले, तो साधक उसे न तो क्रोध बनकर बाहर फेंके कि संसार जल जाए, और न ही उसे अपने हृदय के भीतर उतरने दे कि उसकी अपनी आत्मा ही विषाक्त हो जाए। वह उस विष को अपने ‘कंठ’ (विशुद्धि चक्र) में ही रोक लेता है।
आज के युग में मनुष्य केवल बाहरी भोजन से ही बीमार नहीं है, वह अपनी आँखों और कानों से ग्रहण किए जा रहे वैचारिक कचरे से अधिक रोगी है। निरंतर दूसरों के जीवन में झाँकने की प्रवृत्ति, अनावश्यक सूचनाओं का अंबार, और समाज में स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ ने हमारे मस्तिष्क को एक कूड़ादान बना दिया है। जब तक इस बाहरी कचरे का प्रवेश बंद नहीं होगा, तब तक भीतर की सफाई असंभव है।
इसके साथ ही, साधक की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी ‘भावनात्मक परनिर्भरता’ होती है। यदि किसी ने प्रशंसा कर दी तो वह खिल उठता है, और यदि किसी ने उपेक्षा कर दी तो वह मुरझा जाता है। इसका अर्थ है कि आपके सुख और दुख की कुंजी दूसरों के हाथ में है।
शैव साधक अपने भीतर की इस भीख मांगने की प्रवृत्ति को जड़ से समाप्त करता है। वह अपने आनंद का स्रोत अपने ही भीतर के शिव-तत्व में खोज लेता है। जब आप भीतर से पूर्ण हो जाते हैं, तब बाहरी सम्मान या अपमान आपके लिए केवल हवा के झोंके के समान रह जाते हैं, जो आपको छूकर निकल तो जाते हैं, किंतु आपके भीतर कोई हलचल पैदा नहीं कर पाते।
कंठ आकाश तत्व और विवेक का केंद्र है। विष को कंठ में रोकने का मनोवैज्ञानिक अर्थ है—किसी भी कड़वी घटना को अपने अहंकार या भावनाओं से जोड़ने के बजाय उसे एक तटस्थ अनुभव के रूप में देखना। जब साधक किसी अपमान को अपने भीतर के ‘आकाश’ में ठहरा लेता है और उस पर अपनी प्रज्ञा से विचार करता है, तो वह पाता है कि निंदा करने वाला व्यक्ति स्वयं अज्ञान और पीड़ा से ग्रस्त है।
इस बोध के जागते ही वह अपमान का विष धीरे-धीरे करुणा, क्षमा और आत्मबल के ‘अमृत’ में रूपांतरित हो जाता है। जो साधक इस नीलकंठ-कला को साध लेता है, संसार का कोई भी व्यवहार उसकी मानसिक शांति को भंग नहीं कर सकता।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553

