शैव जीवन शैली में तंत्र मानसिक शक्तियों की सर्वश्रेष्ठ साधन है ! भगवान शिव स्वयं इसके अनादि आचार्य हैं ! भगवान शिव द्वारा बतलाए गये तंत्र विधानों में कौल तंत्र सर्वश्रेष्ठ तंत्र पद्यति है !
कौल तंत्र विशुद्ध मानसिक शक्ति के प्रयोग पर आधारित तंत्र पद्यति है ! इसमें किसी भी प्रकार की वाह्य सामग्री की आवश्यकता नहीं होती है !
किंतु इस तंत्र विधान के परिणाम बहुत ही आश्चर्यजनक हैं ! असाध्य से असाध्य रोगों को भी इस तंत्र विधान से बहुत आसानी से तत्काल परिणाम देते हुए ठीक किया जा सकता है !
किसी को भी राज सत्ता प्रदान करवाई जा सकती है, या कोई व्यक्ति अगर लंबे समय से ग्रह दोष से पीड़ित है, तो इस तंत्र विधान पद्धति से उसको ग्रह दोष से भी मुक्त किया जा सकता है !
इसी वजह से इस तंत्र विधान की लोकप्रियता बहुत तेजी से विकसित हुई थी ! इस तंत्र विधान का प्रयोग राज घराने में ही शुद्ध मानसिक साधना के रूप में किया जाता था !
किन्तु जब भारत में बौद्धों का प्रभाव बढ़ा, तब बौद्ध भिक्षुकों के माध्यम से तंत्र विधान आम जन मानस में विकृत रूप में प्रचारित किया जाने लगा !
प्राय: बौद्ध भिक्षु मांसाहारी और नशा खोर होते थे, तथा अपने परिवार से अलग रहते थे ! उस स्थिति में अपने मनोरंजन के लिये बौद्ध भिक्षुयों ने तंत्र विधान में स्वयं की विलासिता के लिये परम शुद्ध तंत्र विधान में पंच मकार की विकृतियों का प्रवेश करवाया !
उदहारण के लिये सौंदर्य लहरी के भाष्यकार लक्ष्मीधर ने 41वें श्लोक की व्याख्या में कौलों के दो अवान्तर भेदों का वर्णन किया है । उनके अनुसार पूर्व कौल तांत्रिक ब्रहमांड की असीम ऊर्जा से सम्पन्नता प्राप्त करने के लिये श्रीचक्र के मध्य स्थित योनि की पूजा करते थे ! जिस विधान से स्वयं आदि शंकराचार्य जी ने स्वर्ण वर्षा करवाई थी !
जिसे बैद्धों द्वारा विकृत कर के उत्तर कौल तंत्र विधान में तरुणी सुंदरी के प्रत्यक्ष योनि के पूजन का विधान शामिल किया गया और पञ्च मकारों में इसे स्थान देकर मैथुन के नाम पर योनि भोग को ही तंत्र उपासना का अंश घोषित कर दिया गया !
इसी तरह तंत्र में पंच मकार- मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन आदि को बौद्ध तंत्र आचार्यों ने तंत्र उपासना का मुख्य साधन घोषित कर दिया। जबकि शुद्ध तंत्र का इन पंच मकार विकृत विकारों से कोई लेना देना नहीं है !
इस तरह से परम शुद्ध तंत्र उपासना पद्धति का विकृत स्वरूप समाज के सामने आया और समाज ने इसको अस्वीकार कर दिया ! इसी वजह से तंत्र में वाम मार्गी तंत्र की शुरुआत हुई और तंत्र उपासना पद्धति समाज में लोकप्रिय नहीं हो पाई ! इसी वजह से समाज का आम जनमानस तांत्रिकों से कतराता है ! जबकि मूल तंत्र विधान में इस तरह का कोई दोष है ही नहीं !
और बाकी रही कसर मीडिया और टी.वी. चैनल वालों ने तंत्र के विकृत स्वरूप को फिल्मकार पूरी कर दी !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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