आज की चर्चा से वैष्णव थोड़ा नाराज हो जाएंगे, लेकिन यह हमारा धार्मिक सत्य है, देवताओं ने अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए अपने घर की बेटियों को भी दांव पर लगाया है ! जिसका एक उदाहरण आज मैं दे रहा हूं !
महर्षि भृगु के पुत्र शुक्राचार्य जी जब पृथ्वी पर असुरों के आचार्य बने, तब उन्होंने देखा कि देवताओं के अमृत पान के कारण वह निरंतर विजयी होते चले जा रहे हैं, हर युद्ध का परिणाम असुरों की असंख्य मौत और देवताओं का विजय ध्वज है !
तब सृष्टि की व्यवस्था को संतुलित करने के लिए महर्षि भृगु के परामर्श पर असुर आचार्य शुक्राचार्य जी ने मृत संजीवनी विद्याको सिद्ध करने के लिए भगवान शिव की तपस्या की !
जिसकी सूचना मिलते ही सभी देवता शुक्राचार्य का तप भंग करने के लिये देवताओं ने प्राकृतिक उत्पात मचाया ! जैसे बाढ़, भूकंप, तूफ़ान, आंधी, अत्यधिक गर्मी, अत्यधिक ठंड,आदि आदि ! किंतु शुक्राचार्य ने अपना तप नहीं छोड़ा !
तब इंद्र ने अपनी अप्सराओं को शुक्राचार्य का तप भंग करने के लिए भेजा, किंतु वह अप्सरायें भी शुक्राचार्य का तप भंग करने में सक्षम नहीं हो पाई !
तब अंत में हांर कर इंद्र ने अपनी पुत्री जयंती को शुक्राचार्य का तप भंग करने के लिए भेजा !
जयंती शुक्राचार्य के तप की वजह को जान कर बहुत प्रभावित हुई और अपने पिता के आदेश के विपरीत जाकर शुक्राचार्य की सेवा की और उनसे विवाह कर लिया !
जिससे इंद्र क्रोधित हुये बाद में जयंती और शुक्राचार्य के मिलन से देवयानी का जन्म हुआ, जो ययाति की पत्नी बनीं !
कहने का तात्पर्य यह है कि देवता ही नहीं, देवताओं के राजा इंद्र भी, अपने पद, प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये सदैव से अपने घर की बहु बेटियों को इस्तमाल करते रहे हैं ! तभी तो अपनी पत्नी को दांव पर लगाने के बाद भी युधिष्ठिर को देवताओं ने धर्मराज युधिष्ठिर कहा है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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