देवताओं ने छल से सीखी थी मृत संजीवनी विद्या : Yogesh Mishra

यह कथा उस काल की है ! जब वैष्णव जीवन शैली के पोषक देवता पूरी दुनियां में वैष्णव धर्म की स्थापना करना चाहते थे और शैव जीवन शैली के पोषक दानव के अपने अस्तित्व रक्षा के लिये विश्व व्यापी स्तर पर वैष्णव सैनिकों से युद्ध कर रहे थे ! दोनों ही सामान्य मानव नश्वर जीवन से व्यथित थे !

उन्होंने न तो समुद्र मंथन कर अमृत का पान किया था और न ही उन्हें किसी प्रकार के अमरता का वरदान प्राप्त था ! वह सभी भूलोक के सामान्यवाशी थे और पृथ्वी पर सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे थे ! क्योंकि देवता और दानव दोनों ही वर्तमान कश्मीर के मूल निवासी महर्षि कश्यप के पुत्र थे !

इस महायुद्ध में देवता और असुर दोनों ही अपने प्राण गंवा रहे थे ! वैष्णव के अति विध्वंशक हथियारों के आगे असुर कमजोर पड़ा रहे थे ! उनकी मृत्यु भी बहुत तेजी से हो रही थी !

तभी असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने शैव संस्कृति के रक्षक भगवान शिव से इस समस्या का समाधान करने की प्रार्थना की ! तब भगवान शिव ने शुक्राचार्य जी को एक ऐसी विद्या सिखायी जिसकी सहायता से वह वैष्णव सैनिकों से युद्ध में मृत असुरों को उस विद्या से वह पुनः जीवित कर सकते थे ! इसी को कालांतर में मृतसंजीवनी विद्या कहा गया !

शुक्राचार्य, संजीवनी विद्या को अच्छे से जानते थे ! इस विद्या की सहायता से वह असुरों को पुन: जीवित कर दिया करते थे ! अत: शैव दानव मरते और फिर जीवित हो उठते ! इससे उनकी ताकत बढ़ती चली गयी और वैष्णव देवताओं की ताकत क्षीण होती जा चली गयी ! अब वैष्णव देवता शुक्राचार्य से किसी भी हाल में संजीवनी विद्या हासिल करना चाहते थे ! जो कि इतना आसान नहीं था !

अत: वैष्णव देवताओं ने अपने गुरु बृहस्पति के सहयोग से संजीवनी विद्या सिखने हेतु असुर गुरु शुक्राचार्य को छलने की युक्ति सोची !  उन्होंने गुरु बृहस्पति पुत्र कच को गुप्त रूप से यह विद्या सीखने हेतु शुक्राचार्य के पास भेजा ! कच को असुरों के बीच रह कर अपनी सेवा भावना, श्रद्धा और गुरु-भक्ति का झूठा प्रदर्शन कर से असुर गुरु  शुक्राचार्य को प्रसन्न कर संजीवनी विद्या हासिल करने का प्रयास किया ! जिससे असुर घबड़ा गये !

इधर बृहस्पति के पुत्र कच सर्वगुण संपन्न थे ! उनके यौवन, सुंदरता, गुरु-भक्ति और समर्पण को देख कर शुक्राचार्य की रूपवान बेटी देवयानी पर मोहित हो उठीं और उससे किसी भी कीमत पर विवाह करने के स्वप्न देखने लगीं !

यह सब जब असुर जान गये तो उन्होंने कच की हत्या कर दी जिसे शुक्राचार्य ने उन्हें पुनः जीवित कर दिया ! तब एक दिन शुक्राचार्य से छिपाकर असुरों ने कच को फिर से मार डाला और उसके शव को जला कर उसके अवशेषों को पानी में मिलाकर शुक्राचार्य को ही पिला दिया ! अब असुर इस बात से आश्वस्त थे कि अब किसी भी तरह कच पुनः जीवित नहीं हो सकता है !

लेकिन इस बार जो हुआ वह उनकी कल्पना से भी परे था ! जब शुक्राचार्य को इसका पता चला तो उन्होंने फिर से कच को पुनः जीवित करने का प्रयास किया लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान जब उन्हें पता चला कि कच उनके पेट में है !

तो बाध्य होकर शुक्राचार्य को कच को संजीवनी विद्या सिखानी पड़ी ! संजीवनी विद्या सीखने के बाद कच शुक्राचार्य का पेट चीरकर बाहर निकल आया !

और कच, संजीवनी विद्या से शुक्राचार्य को पुनः जीवित कर दिया ! जिससे शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी बहुत प्रसन्न हुई और उसने कच से विवाह का प्रस्ताव रखा ! लेकिन कच ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि वह शुक्राचार्य के शरीर से उत्पन्न हुआ है अत:  इसलिए देवयानी अब उनकी बहन है !

इस बात से देवयानी अत्यंत क्रोधित हो उठीं और उन्होंने कच को श्राप दिया कि वह कभी भी इस संजीवनी विद्या का प्रयोग नहीं कर सकेगा !

इस तरह कच अपने जीवन में कभी भी संजीवनी विद्या का प्रयोग नहीं कर पाया लेकिन शैव गुरु शुक्राचार्य से छल पूर्वक सीखी हुई इस संजीवनी विद्या को अन्य देवताओं को सिखा कर उसने देवताओं के मध्य संजीवनी विद्या का प्रसार किया जिससे देवताओं को वैष्णव संस्कृति की स्थापना में बड़ी मदद मिली !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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