देखना एक दिन सनातन धर्म ही सभी युद्धों को समाप्त करेगा : Yogesh Mishra

 वैसे तो मानव संस्कृति पृथ्वी पर शुरुआती दौर में बहुत बिखरी हुई संस्कृति थी ! प्राकृतिक आपदाओं और भय के कारण मनुष्य धीरे धीरे संगठित होने लगा और छोटे-छोटे समूहों में रहने लगा ! और अनेकों तरह की जीवन शैली का उदय देश काल परिस्थिति के अनुसार हुआ !

इन्हीं विभिन्न जीवन शैली को कालांतर में संस्कृति का नाम लिया जाने लगा ! यक्ष, किन्नर, देव, दानव, सुर, असुर, राक्षस, शैव, वैष्णव, ब्रह्म आदि अनेकों तरह की संस्कृतियों समय-समय पर पनपीं !

कालांतर में सुविधाओं  और वर्चस्व की प्राप्ति के लिये इन संस्कृति के नाम से विकसित मानव समूहों में आपसी संघर्ष शुरू हो गया !  जिससे पूरी पृथ्वी पर अलग-अलग संस्कृतियों में विकसित मानव अपने अपने समूहों के साथ दूसरे मानव समूहों से लड़ने लगा जो संघर्ष आज भी चल रहा है !

 वर्तमान में धर्म के नाम पर हिंदू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी, बौद्ध, जैन आदि आदि विश्वास और अवधारणाओं पर आश्रित मनुष्य का समूह ही तो है जो आज दूसरे मनुष्य के समूह को नष्ट करके अपना प्रभाव और वर्चस्व बनाये रखना चाहता है ! यही तो इस पृथ्वी पर अनादि काल से होता रहा है !

 इसी संघर्ष की भावना ने इस पृथ्वी पर न जाने कितनी संस्कृतियों को विलुप्त कर दिया ! आज भी विभिन्न मानव समूहों में विकसित विश्वास, अवधारणा, जीवन शैली और वर्चस्व की इच्छा ने अभी भी संघर्ष को बनाए रखा है !

 और शायद मनुष्य कभी भी इतना विकसित नहीं हो पाएगा कि इस सब से उठकर इस पृथ्वी पर बिना किसी संघर्ष के जियो और जीने दो के सिद्धांत का अनुपालन कर सके !

 इसी संघर्ष ने अनादि काल से इन मानव समूहों को  आत्मरक्षा और विजय की कामना से अलग-अलग तरह के हथियार विकसित करने की प्रेरणा दी !  मनुष्य अपने बौद्धिक ज्ञान क्षमता संसाधन और संस्कारों के प्रभाव में सदैव से हथियारों को विकसित किया है !

 शुरुआती दौर में जब व्यक्ति शारीरिक संघर्ष से आत्मरक्षा या युद्ध नहीं जीत पाता था तब बौद्धिक परिपक्वता के पढ़ने के साथ-साथ उसने ईद पत्थर से बने हुए हथियारों का इस्तेमाल शुरू किया !

 कालांतर में धातु की खोज हुई और उसने युद्ध के लिए तरह-तरह के धातुओं से आयुध को विकसित किया तीर वाला गधा चक आदि आदि न जाने कितने तरह की हथियार उसने विकसित किए और उन्हें शारीरिक शक्ति के साथ साथ मानसिक शक्तियों के प्रयोग से भी चलाना शुरु किया जिससे मंत्र तंत्र यंत्र यंत्र आदि अनेकों तरह के विज्ञान की उत्पत्ति हुई

 कुछ ही शताब्दी पहले मनुष्य ने बारूद की खोज की और धातु के हथियारों के साथ साथ बारूद से चलने वाले हथियार विकसित किये  और उन्हें बंदूक, तोप, पिस्टल, राइफल  आदि आदि नाम अपनी सुविधा के अनुसार दिये और पूरी दुनिया में प्रथम विश्व युद्ध का आगाज हुआ !

प्रथम विश्वयुद्ध में इस पूरी दुनिया में जो सबसे बड़ा लूजर रहा वह जर्मन देश रहा  जिससे जर्मन निवासियों  का आत्मसम्मान और भावनाएं आहत हुई ! जिसका लाभ उठाकर एडोल्फ हिटलर जर्मनी का चांसलर होना और उसने अपना सबसे पहला फोकस आधुनिकतम हथियारों को विकसित करने पर किया उसने तरह-तरह के हल्के वजन के तेज चलने वाले युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले विमानों की का निर्माण करवाया बारूद के साथ साथ आधुनिकतम हथियारों  की खोज शुरू करें उसी का परिणाम है कि द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति तक हाइड्रोजन बम परमाणु बम जैसे घातक हथियार ने पूरी दुनिया में मानवता को शर्मसार कर दिया !

 और द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत मनुष्य जैविक और बौद्धिक हथियारों की तरफ बढ़ गया है ! आज गोली, बम, बारूद, परमाणु बम हाइड्रोजन बम आदि आदि यह सारी चीजें मात्र  शस्त्रागार में रखे हुए प्राचीन सजावट का  विषय बनकर रह गई हैं !

अब जो युद्ध हो रहे हैं ! उसमें भौतिक हथियार के स्थान पर बौद्धिक हथियार प्रमुख हैं और साथ ही जैविक हथियारों का प्रयोग बौद्धिक हथियारों के  सहायक के रूप में किया जा रहा है !

  युद्ध के हार जीत का मानक भी अब बदल गया है ! अब हार जीत का निर्णय विभिन्न नामों से पुकारे जाने वाली मुद्रा अर्थात धन पर आधारित  हो गया है !  जिस व्यक्ति  समूह के द्वारा जितने अधिक मूल्यवान वस्तुओं का संग्रह कर लिया जाता है उस मूल्यवान वस्तु के मूल्यांकन के अनुसार मुद्रा का मूल्य निर्धारित होता है और जिस देश की मुद्रा का मूल्य जितना अधिक होता है, वह देश उतना ही विकसित और विजई देश माना जाता है !

इस युद्ध में आज नैतिकता, ईमानदारी, राष्ट्रीयता, समर्पण, दया, धर्म, सिद्धांत आदि का कोई स्थान नहीं है ! यह सब प्राचीन काल की भाषा के शब्द हैं ! भारतीय समाज क्योंकि आज भी अपनी प्राचीन जीवन शैली को ही ढो रहा है ! अतः भारतीय समाज के अंदर विकसित हुआ व्यक्ति नैतिकता, ईमानदारी, राष्ट्रीयता, समर्पण, दया, धर्म आदि में उलझा हुआ है !

शायद इसीलिये विश्व के इस प्रतिस्पर्धा के दौर में भारत के मूल हिंदू धर्म पर आश्रित जीवन शैली को मानने वाला मानव समूह “हिंदू” पूरी दुनिया में इस वक्त हर युद्ध में हार रहा है !

 किंतु एक दूसरा कठोर सत्य यह भी है कि आज जो लोग हर बौद्धिक युद्ध को जैविक हथियारों के प्रयोग के द्वारा जीत रहे हैं ! निश्चित रूप से वह कल मानवता के लिये एक बहुत बड़ा खतरा हैं और जिस दिन मानव समूह का बहुत बड़ा अंश इस पृथ्वी में पर इस युद्ध में नष्ट हो जायेगा ! उस दिन अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए दुनिया के सारे मानव समूहों को वापस सत्य सनातन हिंदू जीवन शैली की ओर ही लौटना होगा ! यही हमारे मौन और हार की अंतिम जीत होगी !

और ऐसा हमारे मानवता के इतिहास में सैकड़ों बार हो चुका है कि जब मनुष्य युद्ध करते-करते अपना सर्वस्व नष्ट करके  थक गया  और मानसिक रूप से हार गया तो उसने वापस सत्य सनातन हिंदू जीवन शैली में ही आकर शरण ली ! शायद इसीलिए हिंदू धर्म आदि अनादि होने के साथ-साथ अनंत काल तक स्थिर रहने वाला धर्म है !

क्योंकि मानवता की रक्षा करने का सामर्थ्य बस सिर्फ इसी सत्य सनातन हिंदू जीवन शैली के पास ही है ! जो त्याग, करुणा, दया, नैतिकता, ईमानदारी, समर्पण और ईश्वर में आस्था आदि मानवता के मौलिक सिद्धांतों पर टिकी हुई है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

और अधिक जानकारी के लिये पढ़िये

www.sanatangyanpeeth.in

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