धर्म का अनुकरण क्यों अनिवार्य है ?

धर्म ही मनुष्य की विशेषता है । धर्म विहीन स्वतन्त्रता, स्वेच्छाचारिता या उच्छृंखलता के ही रूप में परिणत हो जाती है । “सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्मात्म भाव” प्राप्त होने से पहले प्राणी को अवश्य ही धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक विभिन्न नियन्त्रणों के परतन्त्र रहना पड़ता है । क्योंकि सामान्य मनुष्य माया के प्रभाव को जाने बिना विवेक पूर्ण नहीं होता है ! इसलिये उसे धार्मिक नियमों का अनुकरण करना चाहिये !

अपौरुषेय वैदिक नियम एवं तदानुसारी निर्मित सहिंता, विभिन्न स्मृति और जीवनदर्शी शास्त्र ही धर्म है । इसी के अनुपालन से जीव का कल्याण होता है !

जिनमें जीवन के सभी पहलू भोजन, पान, शयन, विश्राम, संतानोत्पाति आदि सभी कार्य विधान बतलाये गये हैं !

इसीलिये मनुस्मृति में तथा महाभारत में तीन बार उल्लेख आया है कि ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ !

जिसे भारत सरकार की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) जिसे 1968 में भारत के अंतर्राष्ट्रीय खुफिया मामलों को संभालने के लिए की गई थी तथा नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी ने अपने आदर्श वाक्य के रूप में चुना है !

इस पूर्ण श्लोक को महाभारत के वनपर्व में युधिष्ठिर यक्ष से इस प्रकार कहते हैं कि

धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः ।

तस्माद् धर्मं न त्यजामि, मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

अर्थात मृत धर्म, धर्म को नष्ट करने वाले को नष्ट कर देता है, और संरक्षित धर्म उद्धारकर्ता की रक्षा करता है । इसीलिए मैं धर्म का त्याग नहीं कर सकता क्योंकि धर्म नष्ट होकर मेरा ही सर्वनाश कर देगा ।

इसी विषय को महाभारत में दूसरे सन्दर्भ में अनुशासन पर्व में इस प्रकार कहा गया है !

धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः ।

तस्माद् धर्मो न हन्तव्यः, पार्थिवेन विशेषतः ॥

अर्थात मृत धर्म, धर्म को नष्ट करने वाले को नष्ट कर देता है, और संरक्षित धर्म उद्धारकर्ता की रक्षा करता है । इसलिये धर्म की हत्या नहीं करनी चाहिये, विशेषकर पार्थिव के द्वारा ।

यहाँ पार्थिव का अर्थ राजघराने से है ! दूसरे शब्दों में पृथ्वी पुत्र, बहादुर, पृथ्वी के राजकुमार, सांसारिक पुरुषार्थी होता है ।

इसीलिए अनादि काल से राजघराने सर्वशक्तिमान होते हुए भी धर्म के बंधन से मुक्त नहीं थे ! और जब-जब सर्वशक्तिमान राजघरानों ने धर्म की मर्यादा को तोड़ा है, तो वह राजवंश नष्ट हो गये ! उसकी रक्षा कोई भी तपस्वी और पुरुषार्थ नहीं कर सका !

यही महाभारत की कथा है !

इसलिए समर्थ के अनुसार धर्म के सिद्धांतों की रक्षा हर व्यक्ति को अपने जीवन में अवश्य करनी चाहिए और जो धर्म की मर्यादा को तोड़ता है ! उसका नष्ट होना सुनिश्चित है ! यही ईश्वर की व्यवस्था है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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