नास्तिक होने का तात्पर्य मात्र हिन्दू जीवन शैली का विरोधी होना मात्र नहीं है, बल्कि किसी विशेष जीवन शैली या जीवन दर्शन ( धर्म ) को न मानने वाला भी नास्तिक ही होता है !
इस दुनिया में 6000 से अधिक जीवन दर्शन हैं, जो लगभग 350 धर्मों से संचालित होते हैं !
इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति न तो सभी जीवन दर्शन अपना सकता है और न ही सभी धर्म का अनुगमन कर सकता है !
इसलिए किसी विशेष जीवन दर्शन या धर्म के सापेक्ष उसको न मानने वाला हर व्यक्ति नास्तिक ही है !
इस तरह देखा जाये तो दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति जो किसी न किसी विशेष जीवन दर्शन के सापेक्ष नास्तिक ही है !
क्योंकि हर व्यक्ति किसी न किसी विशेष धर्म या जीवन दर्शन से संचालित होता है और वह किसी दूसरे जीवन दर्शन या धर्म के दृष्टि से नास्तिक ही है !
इसी वजह से वैदिक संस्कृत का अनुगमन करने वालों ने बौद्ध, जैन और लोकायत मतों के अनुयायियों को नास्तिक कहा है !
और अब आधुनिक युग में नव उपजित धर्म ( पारसी, यहूदी, ईसाई, इस्लाम ) का अनुगमन करने वालों को भी हिन्दू समाज ने नास्तिक ही कहा है !
और मजे की बात यह है कि इन सभी धर्म का अनुगमन करने वाले अनुयायियों ने हिंदू धर्म या हिन्दू जीवन शैली का अनुगमन करने वालों को अपनी-अपनी भाषा में नास्तिक ही कहा है !
अतः स्पष्ट है कि नास्तिक शब्द सापेक्ष है ! यह देश, काल, परिस्थिती, धर्म, संस्कृति, जीवन शैली के अनुसार अलग-अलग अर्थों में प्रयोग किया जाता है !
इसलिये नास्तिक होने का सीधा सा अर्थ है कि जो व्यक्ति किसी भी धर्म,संस्कृति या जीवन शैली का अनुगमन नहीं करता है, तो उसे उस विशेष धर्म, संस्कृति, जीवन शैली का अनुमान करने वाले व्यक्ति के सापेक्ष वह व्यक्ति नास्तिक ही है !
इस तरह दुनिया में हम सभी किसी न किसी धर्म, संस्कृति, जीवन शैली के सापेक्ष नास्तिक ही हैं !
क्योंकि नास्तिक शब्द देश, काल, परिस्थिती, धर्म, संस्कृति, जीवन शैली के अनुसार सापेक्ष शब्द है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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