आज के दौर में जब हम फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खोलते हैं, तो अक्सर ऐसा प्रतीत होता है मानो हम किसी आभासी ‘पागलखाने’ या मानसिक रोगियों के जमघट में आ गए हों। हर तरफ अकारण क्रोध, तीखी बहसें, असंवेदनशील टिप्पणियां और दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ मची है।
लेकिन क्या सच में समाज इतना विक्षिप्त हो गया है? इसका उत्तर केवल ‘हां’ या ‘ना’ में नहीं दिया जा सकता। यह स्थिति मानव मनोविज्ञान, आधुनिक जीवनशैली और टेक्नोलॉजी के एक खतरनाक गठजोड़ का परिणाम है। आइए इसके मुख्य कारणों को समझते हैं:
फेसबुक का पूरा तंत्र ‘लाइक्स’, ‘कमेंट्स’ और ‘शेयर्स’ पर आधारित है। जब किसी व्यक्ति की पोस्ट पर प्रतिक्रिया आती है, तो उसके दिमाग में ‘डोपामाइन’ नाम का रसायन स्रावित होता है, जो उसे क्षणिक खुशी का अहसास कराता है। इस सुख को बार-बार पाने की चाहत में लोग एक ऐसे मनोवैज्ञानिक लूप में फंस जाते हैं, जहां वह ध्यान खींचने के लिए अतिरंजित, अजीब या नकारात्मक व्यवहार करने लगते हैं ।
इसका मुख्य कारण आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग भले ही डिजिटल रूप से जुड़े हों, लेकिन असल जिंदगी में वे पहले से कहीं अधिक अकेले और तनावग्रस्त हैं। जब उन्हें अपनी भावनाएं व्यक्त करने, सुकून पाने या सही मनोवैज्ञानिक परामर्श का सुरक्षित स्थान नहीं मिलता, तो वे अपनी सारी कुंठा, निराशा और गुस्सा सोशल मीडिया पर निकाल देते हैं। कई लोगों के लिए फेसबुक एक ऐसा ‘डस्टबिन’ बन गया है जहां वे अपने दिन भर के मानसिक अवसाद को उड़ेल देते हैं।
हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स कोई समाज सेवा नहीं, बल्कि मुनाफा कमाने वाले व्यवसाय हैं। फेसबुक का ‘एल्गोरिदम’ इस तरह से डिजाइन किया गया है कि जो सामग्री लोगों को गुस्सा दिलाती है या विवाद पैदा करती है, उसकी पहुंच सबसे ज्यादा होती है। विवादित और उग्र विचारों वाली पोस्ट्स लोगों को ज्यादा देर तक स्क्रीन से बांधे रखती हैं। इसलिए, हमें जानबूझकर ऐसा कंटेंट ज्यादा दिखाया जाता है, जिससे यह भ्रम होता है कि पूरी दुनिया ही ऐसी नकारात्मक हो चुकी है।
असल जिंदगी में किसी के मुंह पर गलत बात कहना या उसे नीचा दिखाना आसान नहीं होता, क्योंकि वहां सामाजिक मर्यादाएं और तुरंत प्रतिक्रिया का डर होता है। लेकिन मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन के पीछे बैठकर किसी को ‘ट्रोल’ करना बेहद आसान है। यह आभासी दूरी लोगों को एक ऐसा दुस्साहस देती है, जिसमें उनकी भीतर की सबसे बुरी प्रवृत्तियां बिना किसी डर के बाहर आ जाती हैं।
फेसबुक पर दिखने वाला यह तथाकथित ‘मानसिक रोगियों का जमघट’ दरअसल हमारे समाज के गहरे घावों, अकेलेपन और तकनीकी कंपनियों के लालच का ही एक डिजिटल प्रतिबिंब है।
इससे बचने का एकमात्र उपाय डिजिटल जागरूकता और आत्म-मंथन है। हमें यह तय करना होगा कि हम इन कंपनियों के एल्गोरिदम की कठपुतली बनना चाहते हैं या अपनी मानसिक शांति को प्राथमिकता देना चाहते हैं। अपनी ऊर्जा को आभासी बहसों में नष्ट करने के बजाय, वास्तविक दुनिया में गहरे रिश्ते बनाना और स्क्रीन टाइम को सीमित करना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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