बौद्धिक संपदा एक भ्रम

पश्चिम की भोगवादी संस्कृति ने आज बौद्धिक संपदा की परिभाषा ही बदल दी है ! पश्चिमी जगत के अनुसार बौद्धिक संपदा प्रत्येक वह अमूर्त संपत्ति है ! जिसे कानून द्वारा पेटेंट, कॉपीराइट या ट्रेडमार्क के रूप में संरक्षित किया जा सकता है !

इसमें सभी तरह के आविष्कार, साहित्यिक, कलात्मक कार्य, डिजाइन, प्रतीक, चिन्ह, छवियां, संगीत, सॉफ़्टवेयर, विशेष नये खेल, फ़ोटो, चित्र आदि आते हैं !

जबकि वास्तव में यह सब बौद्धिक संपदा नहीं है !

शैव जीवन शैली के अनुसार बौद्धिक संपदा से तात्पर्य प्रकृति द्वारा उपलब्ध हर वह वस्तु, जीव या चिंतन है, जो मनुष्य की बुद्धि को विकसित करने में सहायक है !

क्योंकि मनुष्य की बुद्धि को विकसित करने में एक मात्र प्रकृति ही हमारी सहायक है !

आज मनुष्य पश्चिम की भोगवादी संस्कृति के प्रभाव में बौद्धिक संपदा की गलत परिभाषा गठित करके मानवता ही नहीं प्रकृति और ईश्वर को भी धोखा दे रहा है ।

और उसके दुष्परिणाम भी झेल रहा है !  अवसाद, मानसिक विकलांगता, पक्षाघात, एकांगी जीवन आदि हजारों तरह के मानव कृत विकृतियों को मनुष्य ने गलत परिभाषा गठित करके स्वत: ही निर्मित की हैं और उसके दुष्परिणाम स्वयं ही झेल रहा है !

दूसरे शब्दों में जिस मानव कृत विकृतियों से बचने के लिए व्यक्ति को मात्र अपने को प्रकृति के साथ जोड़ना है, वह सब बौद्धिक सम्पदा है !

क्योंकि मात्र प्रकृति ही मनुष्य का बौद्धिक विकास कर सकती है, अन्य कोई भी नहीं ! इसी से मानवता का पूर्ण कल्याण होगा ! जैसा कि पिछले हजारों वर्षों से हो रहा है !

अगर मनुष्य को प्रकृति के ऊर्जा का सहयोग प्राप्त न हो, तो मनुष्य सदैव अनुभव विहीन अवस्था में रहेगा और उसकी बुद्धि कभी विकसित नहीं हो सकेगी !

शैवों के अनुसार इस बौद्धिक सम्पदा में सृष्टि में उपलब्ध सभी तरह के जीव, जंतु, पशु, पक्षी, वनस्पति, ग्रह, ब्रह्माडीय ऊर्जा आदि सभी कुछ आते हैं, जो प्रकृति के अंदर उपलब्ध हैं और हमें अनुभव देकर हमारे बौद्धिक विकास में सहायक हैं ! यही वास्तविक बौद्धिक सम्पदा है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

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