सनातन ग्रंथों में भी धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं:
ब्रह्मचर्य, सत्य, तप, दान, संयम, क्षमा, शौच, अहिंसा, शांति, अस्तेय.
इसमें भक्ति कहीं नहीं आती है !
भक्ति के नौ रूप हैं श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवा, अर्चना, वंदना, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन । यह नौ रूप आत्म क्रिया योग की नौ तकनीकी हैं और जब इन तकनीकों का ईमानदारी से अभ्यास किया जाता है तो व्यक्ति को अपनी वृत्ति बदलने में सहायता मिलती है !
भक्ति अष्टांग योग में धारणा का अंश है ! अर्थात आप किस ऊर्जा को किस रूप में धारण करना चाहते हैं !
शिव के माया क्षेत्र सृष्टि की यह विशेषता है कि आप ऊर्जा को जिस रूप में धारण करना चाहते हैं, ऊर्जा आपको इस रूप में प्राप्त होने लगती है ! यही भक्ति योग का आधार है !
इसी कारण भक्ति योग के साधकों को हजारों साल बाद भी पूर्व में पिण्ड छोड़ चुके विभिन्न भगवानों के साक्षात् दर्शन अनुभूत होते हैं !
किंतु भक्ति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि जब आप किसी अन्य ऊर्जा को धारण करने लगते हैं, तो आपका मूल ऊर्जा स्वरूप अन्य ऊर्जा के प्रभाव में विकृत होकर नष्ट होने लगता है !
जबकि भगवान शिव की इच्छा यह है कि आप अपने मूल ऊर्जा स्वरूप को नष्ट न करें बल्कि मूल ऊर्जा स्वरूप की विकृतियां में सुधार करके अपने मूल ऊर्जा स्वरूप को संशोधित करें !
जिससे आप पुनः शिव ऊर्जा को प्राप्त करके मुक्ति को प्राप्त कर सकें ! यही मोक्ष है !
भक्ति के इसी मौलिक दोष के कारण भक्ति को हमारे चिंतकों ने कभी भी धर्म का हिस्सा नहीं माना है !
किंतु आज धर्म का व्यवसाय करण हो जाने के कारण कथावाचकों ने जबरदस्ती भक्ति को धर्म का हिस्सा घोषित कर दिया है !
यही सनातन धर्म के सर्वनाश का कारण है !
क्योंकि धर्म व्यक्ति को निर्भीक बनता है और भक्ति माया क्षेत्र में व्यक्ति को भ्रमित करके उसे अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन बनती है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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