जब हम भारत में गरीबी या दरिद्रता के कारणों की चर्चा करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान भ्रष्टाचार, जनसंख्या, या शिक्षा की कमी जैसे पारंपरिक कारणों पर जाता है। लेकिन एक बहुत बड़ा, और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला कारण “अव्यवस्थित सामाजिक शोर” भी है।
यहाँ ‘शोर’ का अर्थ केवल लाउडस्पीकर, डीजे या गाड़ियों के हॉर्न की ध्वनि से नहीं है; बल्कि इसका अर्थ हमारे सामाजिक, नागरिक और प्रशासनिक जीवन में व्याप्त उस ‘अव्यवस्था’ और ‘अनुशासनहीनता’ से है, जो हर दिन हमारी ऊर्जा, समय और संसाधनों को सोख रही है। आइए इसे व्यावहारिक रूप से समझते हैं कि यह अव्यवस्थित शोर किस प्रकार देश को आर्थिक रूप से पीछे धकेल रहा है !
सभी कहते हैं शान्ति ही धन है, लेकिन अव्यवस्थित शोर के कारण भारत में समय की सबसे ज्यादा बर्बादी होती है। सड़कों पर लेन अनुशासन का न होना, बेवजह हॉर्न बजाना, और सिग्नल तोड़ना केवल ट्रैफिक जाम नहीं बनाते, बल्कि यह ‘सिस्टम का शोर’ है।
यदि देश के महानगरों में लाखों लोग हर दिन 2 घंटे केवल जाम में और ट्रैफिक की अव्यवस्था से जूझने में बिताते हैं, तो यह सीधे तौर पर करोड़ों ‘मैन-आवर्स’ का नुकसान है। जो समय और ऊर्जा उत्पादन या रचनात्मक कार्यों में लगनी चाहिए थी, वह सड़क के इस कोलाहल में जलकर राख हो जाती है।
इसके अलावा ध्वनि प्रदूषण और भीड़ का कोलाहल सीधे तौर पर मानव मस्तिष्क की कार्यक्षमता को भी कम करता है। देर रात तक बजने वाले लाउडस्पीकर, निर्माण कार्य की आवाज़ें और भीड़-भाड़ वाले मोहल्लों का शोर लोगों को गहरी नींद नहीं लेने देता।
एक थका हुआ, चिड़चिड़ा और नींद की कमी से जूझ रहा कामगार या कर्मचारी कभी भी अपना 100% नहीं दे सकता। जब पूरे देश का एक बड़ा कार्यबल मानसिक रूप से थका हुआ हो, तो राष्ट्रीय उत्पादकता में भारी गिरावट आती है, जो अंततः दरिद्रता का कारण बनती है।
इसी तरह सरकारी दफ्तरों, बैंकों या किसी भी सेवा केंद्र में अनैतिकता का शोर और अव्यवस्था के रूप में दिखाई देता है। एक साधारण से काम (जैसे कोई प्रमाणपत्र बनवाना या टैक्स जमा करना) के लिए लोगों को कई दिनों तक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। स्पष्ट जानकारी का अभाव और प्रक्रियाओं में जटिलता एक तरह का ‘प्रशासनिक शोर’ है।
दिहाड़ी मजदूरी करने वाला या अपना छोटा व्यापार चलाने वाला व्यक्ति जब किसी सरकारी काम के लिए 2-3 दिन बर्बाद करता है, तो वह सीधे तौर पर अपनी आय का नुकसान कर रहा होता है। यह अव्यवस्था निचले तबके को गरीब बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है।
अव्यवस्थित समाज में नागरिक बोध की कमी होती है, जिससे छोटी-छोटी बातों पर विवाद होते हैं। ऊर्जा का गलत दिशा में प्रवाह: कूड़ा कहाँ फेंकना है, गाड़ी कहाँ पार्क करनी है, या सार्वजनिक स्थानों का उपयोग कैसे करना है, इन बुनियादी बातों पर रोज़मर्रा के झगड़े हम अपना ‘सामाजिक शोर’ बढ़ाते हैं।
जो ऊर्जा समुदाय के विकास, सहयोग और व्यापारिक साझेदारी में लगनी चाहिए, वह अदालती मुकदमों, पुलिस थानों के चक्कर काटने और पड़ोसियों से उलझने में खर्च हो जाती है। यह आर्थिक विकास के लिए ज़हर के समान है।
लगातार शोर, प्रदूषण और अव्यवस्था के बीच रहने से लोग क्रॉनिक स्ट्रेस (लगातार तनाव), हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोगों का शिकार हो रहे हैं।
भारत में दरिद्रता का एक बहुत बड़ा कारण ‘मेडिकल इमरजेंसी’ भी है। अव्यवस्थित जीवनशैली और तनाव के कारण जब परिवार का कमाने वाला सदस्य बीमार पड़ता है, तो इलाज का खर्च अच्छे-खासे मध्यमवर्गीय परिवार को भी गरीबी रेखा के नीचे धकेल देता है।
दरिद्रता केवल पैसों की कमी का नाम नहीं है बल्कि यह जीवन को व्यवस्थित न कर पाने का भी परिणाम है। अव्यवस्थित सामाजिक शोर एक ‘अदृश्य कर’ की तरह है जो हर भारतीय रोज़ चुका रहा है।
जब तक हम अपने सार्वजनिक जीवन में अनुशासन, नागरिक बोध और शांति (खामोशी) को महत्व नहीं देंगे, तब तक केवल आर्थिक नीतियां हमें पूर्ण रूप से समृद्ध नहीं बना सकतीं। देश की वास्तविक प्रगति के लिए इस ‘शोर’ को कम करना और ‘व्यवस्था’ को स्थापित करना नितांत आवश्यक है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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