मानवीय चेतना और मनोविज्ञान की गहराइयों में उतरने पर मैंने किसी को भी बिना तैय्यारी के शिष्य नहीं बनाने का निर्णय लिया है, यह शिष्य न बनाने का निर्णय किसी अहंकार का नहीं, बल्कि मानव मन की जटिलताओं और उसकी बाध्यताओं के यथार्थ बोध का परिणाम है।
आम व्यक्ति का मन जिन गहराइयों में उलझा है, उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि अधिकांश लोग अपना वास्तविक रूपान्तरण के बजाय केवल एक कृत्रिम आश्रय की तलाश में रहते हैं।
मनुष्य का मस्तिष्क मूल रूप से अस्तित्व की रक्षा के लिए बना है। अवचेतन मन में धर्म, आध्यात्म, आर्थिक स्थिति और यश-अपयश को लेकर जो अज्ञात भय है, वह वास्तव में असुरक्षा की भावना का प्रकटीकरण है। व्यक्ति समाज में अपनी छवि और भविष्य की अनिश्चितताओं को लेकर निरंतर एक मानसिक तनाव में जीता है।
यह भय इतना गहरा होता है कि वह हर उस चीज से डरता है जो उसके नियंत्रण में नहीं है। इसलिए वह एक ऐसे गुरु या मार्गदर्शक की तलाश करता है जो उसके इस भय को शांत कर सके, न कि उसे सच्चाई का सामना करा सके।
यह मानव मनोविज्ञान का एक बहुत ही रोचक और विरोधाभासी पहलू है। व्यक्ति अपने दुखों, अपनी आर्थिक चिंताओं और अपने दोषों के बारे में शिकायत तो करता है, लेकिन अवचेतन स्तर पर वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता। इसका कारण यह है कि मनुष्य का मस्तिष्क किसी भी बदलाव से डरता है, चाहे वह बदलाव सकारात्मक ही क्यों न हो।
दुख और दोष समय के साथ व्यक्ति की पहचान बन जाते हैं। उसे उस दुख में एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा मिलने लगती है। दोषों को छोड़ने का अर्थ है स्वयं के भीतर एक बहुत बड़ा ढांचागत परिवर्तन करना, जिसके लिए कठोर अनुशासन और आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता होती है। आम व्यक्ति इस मानसिक श्रम से बचना चाहता है और अपनी पुरानी, परिचित अवस्था में ही बने रहना पसंद करता है।
जब व्यक्ति अपने दोषों पर स्वयं कार्य नहीं करना चाहता, तो उसके भीतर ‘पलायनवाद’ जन्म लेता है। वह अपने जीवन की समस्याओं का समाधान अपने भीतर खोजने के बजाय बाहर खोजने लगता है। यहीं से गुरु से ‘चमत्कार’ की उम्मीद पैदा होती है।
मनोविज्ञान के अनुसार, चमत्कार की इच्छा वास्तव में अपनी जिम्मेदारियों से भागने का एक तरीका है। व्यक्ति सोचता है कि कोई बाहरी शक्ति या कोई सिद्ध पुरुष उसके जीवन में आएगा और बिना उसके अपने प्रयास के, उसके सारे दुख, आर्थिक तंगी और मानसिक क्लेश दूर कर देगा। यह एक बालसुलभ मानसिकता है, जहां व्यक्ति परिपक्व होकर अपनी चेतना का विकास करने के बजाय एक ऐसे अभिभावक की तलाश करता है जो जादू की छड़ी घुमाकर सब ठीक कर दे।
एक सच्चे मार्गदर्शक का उद्देश्य व्यक्ति को उसके अपने भीतर स्थित होने (स्व में स्थिर होने) की प्रेरणा देना होता है, न कि उसे अपना मानसिक गुलाम या निर्भर बनाना। जब व्यक्ति को शिष्य बनाया जाता है, तो अधिकतर मामलों में वह अपनी चिंतन क्षमता और अपना विवेक गुरु के चरणों में रखकर पूरी तरह पराश्रित हो जाता है। यह निर्भरता उसके मानसिक और आध्यात्मिक विकास को वहीं रोक देती है।
चूंकि आम जनमानस अपनी कमजोरियों को ढाल बनाकर केवल वरदान और चमत्कारों की बैसाखी पर चलना चाहता है, इसलिए ऐसे व्यक्तियों को शिष्य बनाना उनके भ्रम को और अधिक पोषित करना है। जो व्यक्ति अपने यथार्थ का सामना करने का साहस नहीं जुटा सकता, जो अपने भयों को पकड़ कर रखना चाहता है, उसे सत्य के मार्ग पर नहीं चलाया जा सकता।
वास्तविक रूपान्तरण के लिए व्यक्ति के भीतर स्वयं के प्रति निर्मम ईमानदारी होनी आवश्यक है, जो चमत्कार की उम्मीद में बैठे व्यक्ति में पूर्णतः अनुपस्थित हो जाती है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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