आज जन्माष्टमी है, आज रात्रि भगवान श्रीकृष्ण का पूजन आदि करके प्रसाद लेकर मैं विश्राम कर ही रहा था कि मुझे स्वप्न में लगा जैसे भगवान श्रीकृष्ण मेरे स्वप्न में आये हैं, वह बहुत दुखी हैं और कह रहे हैं कि
जरा मेरे विषय में निष्पक्ष होकर विचार करो, मेरा जन्म किसी भव्य महल में नहीं, बल्कि कंस के एक अंधेरे कारागार में हुआ। जन्मते ही मुझे अपने माता-पिता से बिछड़ना पड़ा। क्या यह किसी सर्वशक्तिमान का ऐश्वर्य था ? नहीं, यह मेरे मानवीय संघर्ष की पहली सीढ़ी थी।
मेरा बचपन वृन्दावन में असुरों से संघर्ष करते हुये ही बीता ! युवा होने पर अपने ही मामा कंस से संघर्ष करना पड़ा उनके खून से हांथ रंगने पड़े और दस वर्ष तक कंस के ससुर जरासंध से युद्ध करना पड़ा !
जब जरासंध ने मथुरा पर बार-बार आक्रमण किए, तो अपनी प्रजा को व्यर्थ के रक्तपात से बचाने के लिए मैंने युद्ध का मैदान छोड़ दिया, पलायन किया और ‘रणछोड़’ कहलाया।
कथावाचकों ने इसे आज मेरी ‘लीला’ कहकर मुझे महिमामंडित और समाज को गुमराह कर दिया है, जिससे मनुष्य को यह पता न चले कि “भगवान को भी परिस्थितियों के आगे झुकना पड़ता है।“ मैंने वहां सिखाया कि झूठे अहंकार और प्रतिष्ठा से बड़ा मूल्य जीवन की रक्षा और सही रणनीति का होता है।
मेरे जीवन का अंतिम अध्याय भी किसी परीकथा जैसा नहीं था। गांधारी के शाप को मैंने सहर्ष स्वीकार किया। मेरे ही सामने मेरा अपना यदुवंश, मेरे सगे-संबंधी आपसी कलह और अहंकार में लड़कर नष्ट हो गए, और मैं नियति के विधान के समक्ष एक साक्षी बनकर खड़ा रहा। अंततः एक साधारण बहेलिये के तीर से मैंने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।
आज कथावाचक मेरे इस पक्ष की, मेरी अस्वस्थता की और मेरी मृत्यु की चर्चा करने से डरता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मनुष्य अपने कर्मों और जीवन के यथार्थ की जिम्मेदारी से बचना चाहता है।
यदि समाज मेरे संघर्षों और मेरे दुख को स्वीकार कर लेगा, तो उसका यह भ्रम टूट जाएगा कि “भगवान कोई जादुई छड़ी घुमाकर सब कुछ ठीक कर देंगे।” मनुष्य को एक ऐसा चमत्कारिक ईश्वर चाहिए जो उसके हिस्से के कष्ट हर ले, न कि ऐसा मार्गदर्शक जिसके पदचिह्नों पर चलने के लिए स्वयं तपना पड़े।
यही कारण है कि समाज मेरे जीवन से ‘कर्म’ का संदेश सीखने के बजाय, केवल ‘मेरे भरोसे’ बैठकर अकर्मण्यता में अपना सर्वनाश कर लेता है। लोग यह भूल जाते हैं कि कुरुक्षेत्र में मैंने अर्जुन का रथ अवश्य हांका था, उसे ज्ञान अवश्य दिया था, लेकिन उसके हिस्से के बाण मैंने नहीं चलाए थे। युद्ध अर्जुन को ही लड़ना पड़ा था।
मेरा संपूर्ण जीवन कोई चमत्कार नहीं, बल्कि निरंतर ‘कर्मयोग’ का सबसे बड़ा प्रमाण है। मैंने देह धारण की, तो प्रकृति के हर नियम पीड़ा, संघर्ष, बुढ़ापा और मृत्यु का सम्मान किया। जो केवल मेरी जीतों और चमत्कारों को पूजता है, वह मेरे यथार्थ से बहुत दूर है।
मेरा सच्चा भक्त और ज्ञानी वह है जो मेरे संघर्षों से सीखता है, विपत्ति में धैर्य रखता है, और जो यह जानता है कि जब ईश्वर को भी अपने हिस्से का कर्म और संघर्ष करना पड़ा, तो मनुष्य उससे कैसे बच सकता है।
इसलिए, अकर्मण्य होकर मेरे सहारे बैठना छोड़ो। मेरे जीवन की संपूर्णता को देखो और अपने हिस्से का युद्ध स्वयं लड़ो। यही मेरी गीता का वास्तविक सार है।
भगवान के इस संदेश के बाद मैंने उन्हें स्वप्न में ही प्रणाम किया और वह अंतर्ध्यान हो गये !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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