वास्तव में रामायण जैसा कोई ग्रंथ नहीं है ! रामायण ग्रंथ को मूल रूप से महर्षि वाल्मीकि ने “वैदेही चरित्र” के नाम से लिखा था !
इस पुस्तक को लिखने के पीछे मुख्य कारण यह था कि महर्षि वाल्मीकि राजा जनक के “विदेह ध्यान साधना” के विज्ञान से बहुत प्रभावित थे ! जो उन्होंने अष्टावक्र जी महाराज से सीखी थी !
इस हेतु उनका प्राय: मिथिला नगरी आना-जाना बना रहता था ! अतः राजा जनक की पुत्री होने के नाते सीता से उनका स्नेह स्वाभाविक था ! जब सीता का विवाह राम से हुआ तो उन्हें अपार प्रसन्नता हुई क्योंकि वह भगवान श्री राम के अवध क्षेत्र में ही आश्रम बनाकर रहते थे !
किंतु इसके बाद जब राम को वनवास हुआ तो सीता का संपूर्ण समर्पण राम के प्रति देखकर महर्षि वाल्मीकि अत्यंत प्रसन्न हुये ! माता सीता एक राजकुमारी होकर भी राम के साथ राम की सुविधा और सेवा के लिए जंगल चली गयी ! वहां राम के अहंकार और लक्ष्मण की चपलता के कारण माता सीता का अपहरण हो गया !
इसके बाद भी लंका में माता सीता ने जिस साहस के साथ रावण के राज्य में रहकर रावण की अधीनता को अस्वीकार कर दिया, यह नारी जाति के लिये एक बहुत बड़ी प्रेरणा का विषय था !
युद्ध के उपरांत अग्नि परीक्षा देकर जब सीता वापस अयोध्या आयी, तो भगवान राम ने उन्हें गर्भावस्था में ही त्याग दिया और तब उन्होंने अपने पिता के मित्र महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में जाकर दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया और पुन: कभी अयोध्या नहीं आयी !
यह एक आदर्श नारी का उच्चतम चरित्र हो सकता है ! इसी विषय को लेकर महर्षि वाल्मीकि ने अपने कवि व्यक्तित्व होने के कारण एक ग्रंथ का निर्माण किया ! जिसका नाम “वैदेही चरित्र” रखा !
कालांतर में उन्हीं के समकालीन भारद्वाज ऋषि जो कि रावण के सौतेले भाई कुबेर के नाना थे ! उन्होंने महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखे गये “वैदेही चरित्र” का प्रचार प्रसार अपने शिष्यों के माध्यम से करवाया !
किंतु उसमें सीता के महान चरित्र के स्थान पर कुबेर के सौतेले भाई रावण, जिसे भारद्वाज ऋषि कुबेर का शत्रु मानते थे, उनकी हत्या करने वाले राम को अत्यधिक महिमामंडित किया !
परिणाम यह हुआ कि “वैदेही चरित्र” नामक ग्रंथ जो मात्र 24 हजार श्लोकों का ग्रन्थ था, वह राम को महिमामंडित करने के चक्कर में एक लाख बीस हजार श्लोकों का ग्रन्थ हो गया !
कालांतर में विद्वानों ने इस “वैदेही चरित्र” नामक ग्रंथ को “रामायण” कहना शुरू कर दिया ! रामायण का तात्पर्य है राम की अरायण यात्रा अर्थात राम की वनवास यात्रा !
फिर काल के प्रवाह में बहुत से राम कथा वक्ताओं की स्मरण शक्ति कमजोर होने के कारण अलग-अलग समय में ग्रंथ का आकार छोटा किया जाने लगा ! जिससे माता सीता के विराट चरित्र के मूल अंशों को हटा दिया गया !
जिससे रामायण में सीता का विराट चरित्र खो गया और वैदेही चरित्र नामक ग्रंथ रामायण के नाम से राम को महिमामंडन करने के लिये जानी जाने लगी !
इस तरह राम को महिमामंडित करने के लिए “वैदेही चरित्र” नामक ग्रंथ रामायण के रूप में परिवर्तित हो गया ! यह है, रामायण के उत्पत्ति और “वैदेही चरित्र” ग्रन्थ के अपहरण की कथा !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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