विज्ञान द्वारा अमरत्व की खोज : Yogesh Mishra

आपका भविष्य कृतिम बुद्धमत्ता (AI) से भरपूर है ! आज पूरा विज्ञान जगत एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के तरह अमरत्व की खोज में लगा है ! हालांकि यह प्रकृति के नियम से विरुद्ध है ! इसमें सफलता मिले की उम्मीद भी नहीं है बल्कि यूँ कहें कि इसमें विनाश के अधिक होने की संभावना है !

इसके लिये विज्ञान प्रयोगशालाओं में आपके शरीर के नेचरल सेल्स (cells) को पूरी तरह से बदल कर, उसकी जगह नैनो बोट्स आर्टिफिशियल सेल्स बनाने के कार्य में तेजी से लगे हैं ! जिसमे आपके पूर्व की तमाम मेमरी ट्रांसमिट कर दिया जाएगा और यह नैनोबॉट्स आर्टिफिशियल सेल्स आपको लंबे समय तक जीवित रख सकेंगे ! जो आयु हजार वर्ष से अधिक भी हो सकती है !

अभी आपको यह सोचने में मजाक लग रहा होगा ! लेकिन इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर वास्तव में एरिजोना अमरीका की लैब में वास्तव में बहुत तेजी से कार्य हो रहा है !

जिसके तहत आपकी मृत शरीर को गहरे ठण्ड में मशीन द्वारा जमाया जाएगा ! जिसे क्रायोप्रिजर्व कहते हैं ! एन्टीफ्रीज़ प्रिजर्वेटिव करके शरीर को एक कोल्ड टैंक में रखा जाएगा फिर इसमे शरीर के तमाम ब्लड सेल्स निकाले जाते हैं !

वर्तमान में यह प्रोजेक्ट प्राम्भिक स्तर पर है इसलिए यह लोग केवल बॉडी जमाने का काम कर रहे हैं ! जिसके लिये बहुत से धनाड्य लोग अपने पारिवारजन के मृत शरीर को इस आशा में यहाँ सुरक्षित रखाव रहे हैं कि भविष्य में जब विज्ञान और विकसित होगा ! तब इनको वापस जीवित कर लिया जायेगा !

 यह वैज्ञानिक अवधारणा भगवान की प्राकृतिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली है ! विज्ञान भविष्य में इस प्रयोग में कितना सफल होगा, यह तो भविष्य में ही पता लगेगा ! लेकिन पूर्व में विज्ञान की इस पराकाष्ठा को रावण के समय पर कुंभकरण ने भी विकसित कर लिया था !

 इसके पीछे कुंभकरण का उद्देश्य यह था कि अंतरिक्ष यात्रा के दौरान एक आकाशगंगा से दूसरे आकाशगंगा में जाने पर हजारों वर्ष का समय लगता है ! इसलिये यदि भविष्य में कोई व्यक्ति किसी अन्य आकाशगंगा की यात्रा करना चाहे तो उसकी आयु अधिक होना आवश्यक है ! इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुंभकरण ने प्रकृति की व्यवस्था के विपरीत अमृत्व के इस विज्ञान को विकसित कर लिया था !

 जिसे रावण के अमृत्व के विज्ञान से जोड़कर देखा जाता है ! लेकिन काल के प्रवाह में मरना तो रावण और कुंभकरण दोनों को ही पड़ा और भगवान राम की शरण में आये हुये विभीषण का भी अब कुछ पता नहीं है !

इसी तरह की रासायनिक विज्ञान का प्रयोग मिस्र के परामिड में भी शवों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से हमारे पूर्वजों द्वारा किया गया था ! जिसके सैकड़ों उदहारण आज भी मिस्र में देखने को मिलते हैं !

 अर्थात कहने का तात्पर्य है कि अमृत्व की अवधारणा प्रकृति की व्यवस्था के विपरीत है ! अत: इस विषय पर विज्ञान को सफल होने की संभावना बहुत कम है, लेकिन मनुष्य अपने ज्ञान के अहंकार में प्रकृति से लड़ने का प्रयास तो कर ही रहा है, देखते हैं भविष्य में क्या होता है ??

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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