प्राय: मृत्यु का तात्पर्य यह माना जाता है कि एक व्यक्ति के पिंड की अवधि पूरी हो गई और उसकी चेतना ने नया पिंड धारण करने के लिए इस पिंड को त्याग दिया !
किंतु पिंड को त्याग देने के बाद भी व्यक्ति की कामना और वासना उसके बुद्ध, चित, संस्कार, वृत्ति के साथ चेतना में प्रवेश करके अगले पिंड में प्रवेश कर जाती है !
किसी को भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद् भागवत गीता के दूसरे अध्याय में कहा है कि जीव कभी मरता नहीं, वह एक पिंड छोड़कर दूसरा पिंड धारण कर लेता है ! जैसे एक मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नया वस्त्र धारण कर लेते हैं !
किंतु इस अवस्था में प्राप्त मृत्यु व्यक्ति की कामना और वासना के साथ उसके स्मृति रूप में नए पिंड में प्रवेश करके उस व्यक्ति को पुनःअपने नये पिण्ड में अपने पूर्व की कामना और वासना की पूर्ति के लिए बार-बार कार्य करने को प्रेरित करती है !
और यह चक्र अनेकों मृत्यु के बाद भी निरंतर जन्म जन्मांतर तक चलता रहता है !
किंतु शैवों की मृत्यु अलग ही है, उसके लिए किसी पिंड का नष्ट होना आवश्यक नहीं है !
एक सच्चा शैव इस पिंड के साथ रहते हुए भी अपनी कामनाओं और वासनाओं को त्याग कर विदेह की स्थिति को प्राप्त कर लेता है ! जो महामृत्यु की अवस्था है !
और वह इस पिंड में रहते हुए भी अपने इस जीवनकाल में शैव जीवन पद्धति को अपना कर मृत्यु ही नहीं बल्कि महामृत्यु को प्राप्त हो जाता है !
यह महामृत्यु ही एक सच्चे शैव की परम कामना है !
अर्थात सामान्य शब्दों में शैवों को मृत्यु नहीं, बल्कि महामृत्यु चाहिए !
और इस अवस्था को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मास्मि क्रिया योग की साधना सहायक है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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