भगवान, देवता, दैत्य, दानव, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्न, यक्ष, किन्नर आदि सभी पिण्ड धारी या अपिण्डीय सभी ऊर्जा रूप में शिव का ही अंश हैं ! सब एक ही हैं
जो अपने जन्म जन्मान्तर की वृत्ति और प्रवृत्ति के अनुसार अलग-अलग भास्ते हैं !
जो साधक वैष्णव मानसिकता के प्रभाव में इन सभी के मध्य भेद करते हैं, वह कभी भी शैव तंत्र विधान के चरम तक नहीं पहुंच सकते हैं !
जब माता सती के पिता “दक्ष प्रजापति” माया के प्रभाव में इन सभी के मध्य भेद करके अपने सर्वनाश को स्वयं आमंत्रित कर लिए थे, तो आप इस विभेद को करके अपने को शिव का प्रिय कैसे बना सकते हैं !
इसलिए सभी शैव साधकों से मेरा अनुरोध है कि वह शैव साधना के पूर्व ऊर्जा के स्तर पर इस विभेद को अपने मन मस्तिष्क से त्याग दें अन्यथा शैव साधना के चरम तक वह कभी नहीं पहुंच पाएंगे ! क्योंकि यह विभेद शिव को स्वीकार्य नहीं है !
इसीलिए मैं बार-बार कहता हूं वैष्णव पूर्वाग्रह में फंसा हुआ व्यक्ति कभी भी शैव साधना नहीं कर सकता है ! वैष्णव पूर्वाग्रह की जड़े इतनी मजबूत हैं कि व्यक्ति सोचता है कि मैं इससे मुक्त हो गया !
लेकिन जब शिव तप का परिणाम देने के पूर्व चित्त का परीक्षण करते हैं, उसकी परीक्षा मैं आपकी वृत्ति और स्मृति ही आपके असफलता का कारण बन जाते हैं !
क्योंकि शिव कुपात्र को शक्ति नहीं देते हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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