शैव दर्शन में शरीर को हेय या तुच्छ नहीं माना गया है, बल्कि इसे शिव की एक पवित्र अभिव्यक्ति और ईश्वरीय वरदान माना गया है। शरीर अपने आप में अंतिम साध्य नहीं है, बल्कि सर्वोच्च लक्ष्य अर्थात् मोक्ष तक पहुँचने का एक उत्कृष्ट ‘साधन’ है। हमें न तो इसका तिरस्कार करना चाहिए और न ही शारीरिक भोग-विलास में इसे नष्ट करना चाहिए।
हम इसी भौतिक देह के माध्यम से संपूर्ण संसार को अनुभव करते हैं। भूख, प्यास, सुख और दुःख जैसी सभी अनुभूतियाँ इसी शरीर के स्तर पर ही संभव हैं। यह हमारे कर्म-भोग का मुख्य आधार है। इसी के जरिये हम अपने सांसारिक व कार्मिक संबंधों को सफलता पूर्वक निभा पाते हैं और जीवन के ऋण चुका पाते हैं।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह देह ही आत्मज्ञान और मुक्ति का माध्यम भी है। बिना शरीर के न तो ईश्वरीय ज्ञान का श्रवण किया जा सकता है, न शास्त्रों का अध्ययन, और न ही सत्य का गहन विश्लेषण किया जा सकता है।
अतः शरीर को कष्ट देना या इससे घृणा करना ईश्वर के आशीर्वाद का तिरस्कार करना है। यह देह वह पवित्र मंदिर है, जिसमें बैठकर आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करती है। इसलिए, इस अनमोल उपहार का सम्मान करें, इसे स्वस्थ रखें और इसका सदुपयोग आध्यात्मिक जागृति के लिए करें।
शरीर ईश्वर द्वारा प्रदत्त किया गया एक आशीर्वाद है हमें ईश्वर के आशीर्वाद का तिरस्कार नहीं करना चाहिए और न ही इसके साथ अत्यधिक आसक्ति रखना चाहिए। शरीर साधन है, साध्य नहीं। शरीर के माध्यम से ही हम इस संसार को अनुभव करते हैं। भूख, प्यास, सुख, दुःख सब शरीर के स्तर पर अनुभव होते हैं। यही कर्म भोग का आधार है ! इसी शरीर से कार्मिक सम्बन्ध निभाये जा सकते हैं ! यह शरीर ही मुक्ति का आधार भी है ! यही ज्ञान श्रवण, अध्ययन, विश्लेषण और मुक्ति का माध्यम है ! इसलिये ईश्वर द्वारा दिये गये इस शरीर का तिरस्कार मत करो !
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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