विश्व के सभी धर्म अपनी अलग-अलग संस्कृतियों से उपजे हैं और यातायात की सुविधा और तकनीकी के कारण आज यह धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल गए हैं ।
इसीलिए सभी धर्म के मध्य प्राय: नियमों का विरोधाभास पाया जाता है और जब सभी धर्म परस्पर नियम विरोधी हैं, जो अलग-अलग जीवन शैली और संस्कृति से उपजे धर्म एक जैसे कैसे हो सकते हैं ! इसलिये सर्व धर्म समभाव का मंत्र देना सबसे बड़ी मूर्खता है !
इसलिए स्वधर्म का अनुकरण करना चाहिए ! हम जिस जीवन शैली में पैदा हुए और जिस जीवन शैली का अनुकरण कर रहे हैं, हमें उसी के अनुरूप धर्म का अनुकरण करना चाहिए !
यदि आप अपनी जीवन शैली के विपरीत धर्म का अनुकरण करेंगे, तो निश्चित रूप से आप काल के प्रवाह में नष्ट हो जाएंगे ! यही वजह है कि आज दूसरे देशों में उपजे धर्म जिन जगहों पर जाते हैं, वहां उन्हें अपने विस्तर के लिए छल और हिंसक बल का सहारा लेना पड़ता है ! यह उनके विस्तार का स्वाभाविक स्वरूप नहीं है !
यदि दूसरे परिवेश में उपजे हुए धर्म छल और हिंसक बल का सहारा न लें, तो उन्हें किसी भी दूसरी जीवन शैली में सामाजिक स्वीकृति प्राप्त नहीं होगी !
इसीलिये धर्म की दुकान चलाने वाले समाज का शोषण करने के लिए ही अपने धर्म को विस्तारित करने पर अपनी ऊर्जा और अपने संसाधनों का अनावश्यक व्यय करते हैं ! जिससे उनका धर्म की ओट में होने वाला व्यवसाय विकसित हो सके !
और वह अपने धर्म का आडम्बर या भय दिखा कर, उनके धर्म का अनुपालन करने वालों के संसाधन का जीवन भर शोषण करके अपनी सुख सुविधा के संसाधन इकट्ठे कर सकें ! यही “सर्वधर्म समभाव” का सत्य है ।
अत: “सर्वधर्म समभाव” से बड़ी मूर्खता और छल पूर्ण वक्तव्य कोई नहीं है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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