सर्वस्व को स्वीकारना एक तप है

समाज में बड़े-बड़े काम कैसे होते हैं

प्राय: लोग अपने जीवन के सभी निर्णय अपनी मन:स्थिति, रुचि और स्वार्थ से लेते हैं । यह वृत्ति प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग होती है, अतः किसी एक कार्य को करने में सभी व्यक्तियों में अंतर विरोध पैदा हो जाता है ।

किंतु एक परिपक्व मस्तिष्क दूसरे की मनोदशा को समझ कर निर्णय लेता है, उस स्थिति में व्यक्ति को अपने मन:स्थिति, स्वार्थ और रुचि से ऊपर उठ कर निर्णय लेना पड़ता है । तभी वह समाज में बड़े-बड़े काम कर सकता है ।

अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति दूसरे की मनोदशा को समझ सकता है, वही सर्वस्व को स्वीकार कर समाज में बड़े बड़े कार्य कर सकता है और जो व्यक्ति दूसरे की मनोदशा को नहीं समझ सकता है । वह अपने रुचि और स्वार्थ के दायरे में अपने जीवन को तो जी लेता है, किन्तु कभी भी समाज में बड़े बड़े कार्य नहीं कर पाता है ।

संसार में सफलता पूर्वक जीने के लिए इंसान को सर्वस्व को स्वीकारना ही पड़ता है । निश्चित तौर पर अपने वृत्ति के आवेग में निजी निर्णय कोई भी ले सकता है, किंतु जब हम समझ के साथ जीते हैं, तो हमें समाज के अन्य लोगों के मनोभावों को भी उनकी संवेदना के अनुसार समझना पड़ता है और उसके अनुसार निर्णय लेने पड़ते हैं । यही जीवन में सफल व्यक्ति के लक्षण हैं ।

बिना टीम के कोई बड़ा उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है । यहाँ टीम का तात्पर्य ही है कि आपको दूसरे के मनोभाव का सम्मान करना पड़ेगा । इसी को सर्वस्व को स्वीकारना कहा जाता है ।

ऐसी स्थिति में यदि आपकी रुचि किसी विशेष विषय में नहीं भी है, तब भी एक टीम लीडर होने के नाते आपको दूसरे के मनोभाव को समझते हुए कार्य करना पड़ेगा अन्यथा आपकी टीम कभी किसी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पायेगी ।

सफल टीम लीडर का यही लक्षण है कि वह अपने टीम के सभी सदस्यों के मनोभाव में सामंजस्य से स्थापित करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करे । तभी वह समाज में बड़े बड़े कार्य हो सकते हैं ।।

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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