इतिहास गवाह है, जब-जब महापुरुषों ने अपने विचारों से समाज को बदलने की कोशिश की है, तब तब समाज ने उस विचारक को मौत के घाट उतार दिया ! फिर वह चाहे सुकरात हो, ब्रूनो हो, ओशो हो, रावण हो, या फिर भीष्म पितामह हो !
समाज एक निश्चित परम्परा में जीना चाहता है और जब भी समाज के ढररे को बदलने के लिए कोई विद्वान अपने विचार रखता है, तो समाज के व्यवस्था के ठेकेदार, जो उसी आवेशित समाज में अपनी अय्याशी कर रहे होते हैं, वह लोग उस विचारक को उसी समाज के सामने नष्ट कर देते हैं ! जिस समाज को एक विचारक बदलना चाहता है !
चार्वाक, गौतम बुद्ध, कबीर, येशुमसी आदि बहुत से ऐसे समाज सुधारक हुये हैं जिनको उनके समाज के लोगों ने ही नष्ट कर दिया है, इस सूची में बहुत से नाम जोड़े जा सकते हैं !
लेकिन यह वैचारिक परिवर्तन एक निरंतर प्राकृतिक प्रक्रिया है ! समाज को विकृत करने वाले समाज के ठेकेदार हमेशा समाज को नियंत्रित करने की कोशिश करते रहेंगे ! क्योंकि यही दुर्व्यवस्था ही इन समाज के ठेकेदारों के अय्याशी का आधार है !
और समाज में नये समाज सुधारक विचारक पैदा होना यह प्रकृति की व्यवस्था है !
इसी को भगवान श्री कृष्ण ने दूसरे शब्दों में कहा है कि :-
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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