तंत्र में मुद्रा का मतलब है, हाथों की विशेष मुद्राएं ! इन मुद्राओं का इस्तेमाल शैव योग और ध्यान में प्रक्रिया में किया जाता है ! विशेष मुद्राओं से शरीर में ऊर्जा का प्रवाह बेहतर होता है और मन शांत होता है और प्रारब्ध की ऊर्जा बदले लगती है ! मुद्राओं से तंत्रिका तंत्र पर सकारात्मक असर पड़ता है !
तंत्र मुद्रा साधना में भाग्य परिवर्तन के लिये विशेष मुद्राओं का इस्तेमाल किया जाता है ! मुद्राओं का इस्तेमाल ध्यान को गहरा करने और शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है.
मुद्रा तंत्र साधना का तात्पर्य हाथों और उंगलियों की विशेष स्थिति से होता है।
भगवान शिव द्वारा बतलाये गये योग व तंत्र ग्रंथों के अनुसार विशेष मुद्राओं से साधक अपने आंतरिक स्थिति का ज्ञान प्राप्त कर अपने वृत्तियों में सुधार कर अपने प्रारब्ध को भी बदल सकता है !
भाग्य को बदलने के लिये किसी पूजा, अर्चना, उपासना मंत्र, मंदिर आदि की कोई आवश्यकता नहीं है ! यह मुद्रा महाविज्ञान से बाहर से भीतर की यात्रा करने का प्रयास सिद्ध होता है।
जो साधकों के प्रयोगों से भी सिद्ध हो चुका है ! जिस प्रकार सूक्ष्म स्थितियों का प्रभाव स्थूल क्रियाओं पर पड़ता है, उसी प्रकार स्थूल क्रियाओं में मुद्रा परिवर्तन करके अपने सूक्ष्म जगत को भी बदला जा सकता है ! यही ग्रहों से प्रारब्ध को मुक्त करने की क्रिया है ।
मानव के शरीर में हाथों विशेष कर अगुंलियों का बड़ा महत्व है। मानव के अँगुलियों का सीधा सम्बन्ध मानव मस्तिष्क से जुड़ा हुआ है ! जिस मस्तिष्क से कर्म और शरीर दोनों संचालित होते हैं । जो पूरी तरह से स्वतन्त्र होने पर ग्रहों से नियंत्रित होते हैं ! जो हमारे अनियंत्रित सुख दुःख का कारण हैं !
जीवन के इस अनियंत्रित सुख दुःख को तंत्र मुद्रा विज्ञान की मदद से पूरी तरह बदला जा सकता है !
प्रत्येक मुद्रा में शरीर को उचित समय (तीन से पांच मिनट) तक रखा जाता है। जिसका प्रभाव उस मुद्रा से हमारे भीतरी ऊर्जा प्रवाह पर पड़ता है और हमारा जीवन बदलने लगता है !!
मानव पूर्व वैदिक काल में मुद्राओं द्वारा ही संपर्क साधता था। इसका पूर्ण ज्ञान मुद्रा शास्त्र से मानव को प्राप्त होता है। मुद्राओं का लौकिक अर्थ तो है ही ,यह अलौकिक ऊर्जा प्राप्ति में परम सहायक होते हैं। इनका प्रभाव चक्रों पर पड़ता है जिससे चक्रों की क्रियाशीलता प्रभावित होती है ,फलतः वहां से निकलने वाली तरंगों की मात्रा प्रभावित होती है और व्यक्ति की आतंरिक रासायनिक क्रिया के साथ ही उसके सोच-व्यवहार ,कार्य ,मानसिकता आदि में परिवर्तन आता है।
ब्रह्मांडीय ऊर्जा से संपर्क बनता है चक्र विशेष की क्रियाशीलता के अनुसार और व्यक्ति में तथा आसपास उस ऊर्जा का संघनन बढ़ता है, व्यक्ति की औरा प्रभावित होती है साथ ही संपर्क में आने वाले व्यक्ति भी तदनुरूप प्रभावित होते हैं। तंत्र में मुद्राएँ आवश्यक अंग हैं।
इस विज्ञान के विशेष सत्र आयोजित किये जा रहे हैं ! और अधिक जानकारी के लिये संस्थान में संपर्क कीजिये !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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मोबाईल : 9453092553
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