भीष्म पंचक अनुष्ठान को कालांतर में वैष्णव के प्रभाव में विष्णु पंचक अनुष्ठान के नाम से भी जाना जाने लगा है।
जो लोग कार्तिक मास के व्रत करने में असमर्थ हैं, वह कार्तिक के अंतिम 5 दिनों के दौरान यह अनुष्ठान करते हैं और जिससे उन्हें पूरे कार्तिक माह के व्रत का लाभ मिलता है ।
यह अनुष्ठान कार्तिक माह के अंतिम 5 दिनों में जब पितामह भीष्म ने अपने शरीर को छोड़ने की तैयारी की थी उस दौरान किया जाता है । इस अनुष्ठान से चातुर्मास्य (चार महीने की अवधि) के व्रतों के समान ही पुण्य प्राप्त होता है !
इस अनुष्ठान का प्रयोग यदि किसी की कुण्डली मांगलिक हो, विवाह नहीं हो रहा हो या दाम्पत्य जीवन में निरंतर कष्ट बना हुआ है ! वह सभी उपाये कर चूका हो किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ हो, तब ब्रह्मास्त्र के तौर पर भीष्म पंचक अनुष्ठान किया जाता है !
इस भीष्म पंचक अनुष्ठान के दौरान जजमान और अनुष्ठान कर्ता दोनों को अनाज का सेवन नहीं करना है ! और पूरी रीति से शैव जीवन शैली अपनाना है !
पांच दिनों तक मात्र दूध या पानी का सेवन करना है, चिड़िया को दाना डालना है ! वहीँ बैठ कर चिड़िया के कोलाहल के मध्य “निर्वाण तत्व विसर्जन” का “नेति ध्यान” करना है ! सफ़ेद काटन वस्त्र पहनना है ! भूमि पर बिना बिस्तर के मात्र कुशा की चटाई पर रात्रि विश्राम करना है और निरंतर पांच दिनों तक भीष्म पंचक अनुष्ठान के मन्त्र का जप करना है !
पांच दिन के बाद समस्त प्रयोग की गयी वस्तु को जल में प्रवाहित करते हुये, शिव से अहंकार वश किये गये पापों की क्षमा हेतु पूजन करके अनुष्ठान पूर्ण करना है !
इससे शिव भक्तों को अपने को शिव आराधना के लिये तैय्यार करने के लिये आत्म-अनुशासन, विनम्रता और समर्पण को मजबूत करके आध्यात्मिक ऊर्जा से स्वयं को विकसित करने का अवसर मिलता है !
माता सती ने इसी अनुष्ठान को कार्तिक माह से आरम्भ करके महाशिवरात्रि तक जारी रख कर भगवान शंकर को विवाह के लिये तैय्यार किया था !
यह अनुष्ठान सभी तरह के दाम्पत्य दोष निवारण के लिये ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान है ! मेरे निजी अनुभव में यह कभी असफल नहीं हुआ है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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