‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ एक संस्कृत वाक्यांश है ! इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति धर्म की रक्षा करता है धर्म उस व्यक्ति की रक्षा करता है ! यह वाक्य महाभारत और मनुस्मृति में सिद्धान्त के रूप में मिलता है !
संघ के अनुषांगिक संगठन “विश्व हिंदू परिषद” का आदर्श वाक्य भी है ! नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी का भी यह आदर्श वाक्य है ! साथ ही रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) और इंडियन इंटेलीजेंस एजेंसी जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संस्थानों का भी यह ध्येय वाक्य है !
किंतु हमारे शास्त्रों में वर्णित घटनाओं का अवलोकन किया जाये
तो यह पाया जाता है कि यह सिद्धांत नितांत ही अव्यवहारिक और गलत है !
इसे मैं एक उदाहरण से समझाता हूं !
माता सीता मिथिला नरेश राजा जनक की पालनहार पुत्री थी औरअयोध्या के राजा दशरथ के पालनहार पुत्र भगवान श्रीराम से इनका विवाह हुआ था !
जिस दांपत्य जीवन को इन्होंने पूर्ण धर्म पालन के साथ जीवन भर निभाया और भगवान श्री राम का हर विपरीत परिस्थिति में उनके साथ रहकर अपने पत्नी धर्म का पालन भी किया !
किंतु अंततः भगवान श्री रामके तिरस्कार पूर्ण व्यवहार के कारण इन्हें गर्भावस्था में राजमहल त्याग कर वाल्मीकि आश्रम में जाकर बच्चों को जन्म देना पड़ा !
और अंततः करुण क्रंदन अवस्था में माता सीता को कुएं में कूद कर भू समाधि लेनी पड़ी !
याद रहे माता सीता के जीवन का एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जहां पर उन्होंने सतित्वपूर्ण पत्नी धर्म का निर्वहन न किया हो !
वह पूरे जीवन धर्म के मर्यादा की रक्षा करती रही और जब उनके ऊपर विपत्ति आयी, तब धर्म ने उनकी कोई रक्षा नहीं की !
आज के युग में कश्मीरी पंडितों ने अपने धर्म की रक्षा के लिए कई पीढियां तक जुल्म सहे और अंतत उन्हें कश्मीर से अपनी बहू, बेटी और संपत्ति तीनों छोड़कर भागना पड़ा ! धर्म ने उनकी कोई रक्षा नहीं की !
कमोवेश यही स्थिति आज बांग्लादेश की है, वहां पर भी लंबे समय से हिंदू धर्म का पालन करने वाले लोग अनेकों अत्याचार सह रहे हैं, किंतु आज तक कभी भी धर्म ने उन हिंदुओं की रक्षा नहीं की और न ही कोई भगवान उनकी रक्षा के लिए प्रकट हुआ !
इसी तरह हमारे देश का इतिहास भी इसी तरह की हजारों घटनाओं से भरा पड़ा है ! जहां पर हर सनातन भारतीय ने अपने धर्म की रक्षा के लिए अपनी गर्दन भी कटवा दी, लेकिन धर्म ने उनकी कोई रक्षा नहीं की !
ऐसे ही बहुत से उदाहरण हमारे जीवन और शास्त्रों में प्रत्यक्ष हैं ! जहां पर व्यक्ति धर्म की रक्षा करते-करते मर गया ! लेकिन उस व्यक्ति की विपरीत परिस्थिति में कभी भी धर्म ने पलट कर कोई रक्षा नहीं की !
इसलिए “धर्म रक्षति रक्षिता” का सिद्धांत मुझे नितांत ही अव्यवहारिक लगता है ! इसलिए मात्र धर्म या भगवान के भरोसे बैठे रहना उचित नहीं है !
व्यक्ति को अपनी रक्षा के लिए अन्य पुरुषार्थ पूर्ण प्रयास भी करते रहना चाहिए, क्योंकि विपरीत परिस्थितियों में कोई भगवान या धर्म आपकी रक्षा करने नहीं आएगा !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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