सतयुग में देवताओं और असुरों के बीच लगभग सौ वर्षों तक निरंतर और भयंकर युद्ध चला। यह युद्ध केवल अस्त्र-शस्त्रों का नहीं था, बल्कि सत्ता, संसाधनों और संतुलन के लिए लड़ा गया महा संग्राम था !
जिसने तीनों लोकों की आर्थिक नींव हिला दी। इतने लंबे काल तक चले इस युद्ध में यज्ञ-हवन पूजन आदि सब बंद हो गये, कृषि और व्यापार नष्ट हो गये, नगर-राज्य सभी उजड़ गये और समृद्धि के स्रोत क्रमशः क्षीण होते चले गये।
इस निरंतर संघर्ष का सबसे गहरा प्रभाव धन-संपदा, वैभव और ऐश्वर्य पर पड़ा। जो धन लोक कल्याण, धर्म और व्यवस्था के संचालन में लगता था, वही धन देवताओं और असुरों को युद्ध की अग्नि में झोंकना पड़ा।
परिणाम यह हुआ कि दोनों पक्ष के स्वर्ण, रत्न, अन्न और संसाधन समाप्त होने लगे। स्थिति इतनी विकट हो गई कि स्वयं धन की अधिष्ठात्री देवी माता लक्ष्मी, जो सदा समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती थी, वह दरिद्र हो गयी तथा देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर, जिनके अधीन समस्त देवताओं का ऐश्वर्य भंडार था, वह भी इस विनाशकारी युद्ध में ख़त्म हो गया।
युद्ध के निरंतर व्यय, अंधाधुंध दोहन और धर्म-संतुलन के टूट जाने से धन का प्रवाह रुक गया। जहाँ पहले दान, यज्ञ और सत्कर्मों से धन की वृद्धि होती थी, वहाँ अब केवल युद्ध में दोनों पक्षों का धन नाश रहा था।
इसी असंतुलन के कारण लक्ष्मी का स्थायित्व डगमगा गया और कुबेर के कोष भी खाली हो गये। यह दृश्य अपने आप में एक गहरी प्रतीकात्मक शिक्षा थी कि युद्धों से धर्म और जीवन के संतुलन नष्ट हो जाते हैं, तो धन स्वयं जब देवताओं से भी दूर चले जाते हैं, तो मनुष्य की क्या औकात है।
धीरे-धीरे युद्ध के प्रभाव से तीनों लोकों—देवलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक—में दरिद्रता फैलने लगी। लोग भूख, अभाव और अशांति से ग्रस्त हो गये। यज्ञ रुक जाने से देवताओं की शक्ति क्षीण होने लगी और असुरों का प्रभाव भी स्थिर नहीं रह पाया। तब मानवता के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया !
तब माता लक्ष्मी और कुबेर को यह बोध हुआ कि यह संकट केवल उनका निजी नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। अंततः गहन चिंता और आत्ममंथन के पश्चात दोनों प्राणियों की रक्षा के लिये भगवान शिव की शरण में गये।
शिव, जो संहार और सृजन दोनों के अधिपति हैं, संतुलन और वैराग्य के प्रतीक हैं, लक्ष्मी और कुबेर उनकी शरण में गये ! उन्होंने इस संकट से समाधान के लिये लक्ष्मी और कुबेर को उनका खोया हुआ ऐश्वर्य लौटाने और फिर समस्त सृष्टि में फिर से धन का प्रवाह, धर्म का संतुलन और समृद्धि की स्थापना के सूत्र बतलाये !
यह गुप्त एवं गूढ़ दिव्य ज्ञान दिया कि धन कैसे टिकता है, कैसे बढ़ता है और कैसे लोक कल्याण के द्वारा ऐश्वर्य मिलता है का साधन बनता है।
तथा साथ ही प्रकृति के संतुलन के लिये इस गूढ़ ज्ञान के देवता अर्थ भैरव की उत्पत्ति की जो व्यक्ति इस कलयुग में संपन्न और समृध्य होना चाहता है उसे इस अर्थ भैरव के गूढ़ ज्ञान को अवश्य जानना चाहिये !!
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