जब आप किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराते हैं, तो वह कृत्य प्रायः करुणा और अंतरात्मा की पुकार से उत्पन्न होता है। वहाँ कोई योजना, दिखावा या भविष्य की आकांक्षा नहीं होती। यह ‘निष्काम कर्म’ के निकट है, जो आत्मा को बांधता नहीं है।
इसके विपरीत, भंडारा कभी बिना योजना, आमंत्रण और सामाजिक प्रतिष्ठा की इच्छा के नहीं होता। भंडारे के मूल में यह सूक्ष्म अहंकार बैठा होता है कि “मैं आयोजन कर रहा हूँ”, “मैं सक्षम हूँ” और “समाज मेरी जय-जयकार करे”। जहाँ ‘मैं’ (अहंकार) आ गया, वहीं कर्म का भारी बंधन निर्मित हो जाता है।
भूखे को भोजन कराने पर उसकी आत्मा से जो तृप्ति की तरंग निकलती है, वह प्रकृति के संतुलन में सहायक होती है। परंतु भंडारे में प्रायः वे लोग भोजन करने आते हैं जो पहले से ही संपन्न हैं या जिन्हें वास्तव में भोजन की कोई आवश्यकता नहीं है। जो व्यक्ति भूखा नहीं है, उसे अपने अहंकार की तुष्टि के लिए भोजन कराना प्रकृति के संसाधनों का दुरुपयोग है।
कर्म विधान के अनुसार, आप जितने लोगों को अकारण भोजन कराते हैं, उन सभी के साथ आपका नया ‘ऋणानुबंधन’ (कर्म का खाता) खुल जाता है। उस ऋण को चुकाने के लिए आपको बार-बार जन्म लेना पड़ेगा और उन सभी आत्माओं के साथ किसी न किसी रूप में जुड़ना पड़ेगा। यह जन्म-मरण के चक्र में बुरी तरह उलझने की प्रक्रिया है।
भंडारे के आयोजन में भारी मात्रा में अन्न पकाया जाता है। उसमें कई बार अन्न का अपमान होता है, भोजन झूठा छोड़ा जाता है और अव्यवस्था के कारण तामस वृत्ति उत्पन्न होती है। गीता के अनुसार ऐसा कृत्य जहाँ अन्न का अनादर हो और जो दिखावे के लिए किया जाए, वह पूर्णतः राजस या तामस श्रेणी में आता है।
सात्विक दान वही है जो उचित देश, काल और पात्र (जिसे सच में आवश्यकता हो) को बिना किसी प्रतिफल की इच्छा के दिया जाए। अपात्र को दिया गया दान पुण्य नहीं, अपितु पाप और पतन का कारण बनता है।
जब व्यक्ति भंडारा करता है, तो समाज में उसकी प्रशंसा होती है। उस वाहवाही और यश के रूप में वह अपने किए गए कर्म का फल इसी लोक में तुरंत भोग लेता है। इतना ही नहीं, उस दिखावे और अभिमान के कारण उसके पूर्व जन्मों के संचित पुण्य (सौभाग्य) भी तेजी से नष्ट होने लगते हैं। जब पुण्यों का कोष खाली हो जाता है, तो व्यक्ति का पतन (सर्वनाश) सुनिश्चित हो जाता है।
अगले जन्म में या इसी जन्म के अंतिम चरण में प्रकृति उसे दरिद्रता और असहाय अवस्था में धकेल देती है, ताकि उसके भीतर का कर्तापन और दम्भ पूरी तरह टूट सके।
चेतना के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि प्रकृति को किसी के दिखावे की आवश्यकता नहीं है। भूखे को भोजन कराना धर्म है क्योंकि वह प्रकृति की आवश्यकता को पूरा करता है, लेकिन भंडारा करना व्यक्ति के अपने अहंकार का विस्तार है।
कर्म बंधन का यही अटल नियम है कि जो कर्म बिना ‘मैं’ के किया जाए वह मुक्त करता है, और जहाँ ‘मैं’ आ गया, वहीं वह कृत्य अंतहीन जन्मों की श्रृंखला और पतन का कारण बन जाता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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