यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि ईश्वर या प्रकृति मनुष्य को केवल मूलभूत शारीरिक आवश्यकताओं के साथ इस दुनिया में भेजती है। जब कोई शिशु जन्म लेता है, तो उसकी चेतना केवल भूख, प्यास, नींद और सुरक्षा जैसी जैविक जरूरतों तक सीमित होती है।
उसे रोकर अपनी आवश्यकताएं जताना प्रकृति सिखाती है, लेकिन इसके अलावा सब कुछ उसे इसी संसार में आकर सीखना पड़ता है। मनुष्य का मस्तिष्क जन्म के समय एक कोरी स्लेट की तरह होता है, जिस पर उसके परिवेश, अनुभवों और सबसे महत्वपूर्ण है, उसके स्वयं के प्रयासों से जीवन की इबारत लिखी जाती है।
जीवन में उत्कृष्ट भावनाएं और गुण स्वतः उत्पन्न नहीं होते, बल्कि उन्हें सचेत रूप से सीखना और विकसित करना पड़ता है। मनुष्य की प्राकृतिक वृत्ति अक्सर स्वार्थ और आत्म-संरक्षण की होती है।
इसलिए, यदि किसी को स्वाभाविक रूप से प्रेम करना नहीं आता, तो इसमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है; प्रेम करना भी सीखा जा सकता है। बिना शर्त किसी अन्य व्यक्ति को महत्व देना, उसकी कमियों के साथ उसे स्वीकार करना और उसकी खुशी में अपनी खुशी खोजना एक कला है, जिसे अहंकार त्यागकर ही सीखा जा सकता है।
इसी प्रकार, प्रकृति का आदिम नियम भले ही ‘मजबूत का अस्तित्व’ (सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट) रहा हो, लेकिन एक कमजोर और असहाय के प्रति करुणा महसूस करना हमारी पाशविक वृत्तियों के विरुद्ध एक सचेत और श्रेष्ठ चुनाव है। यदि दया करना नहीं आता, तो छोटे-छोटे परोपकारी प्रयासों से दया करना सीखना चाहिए।
इस विकास यात्रा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है “कृतज्ञता”। मनुष्य का अहंकार अक्सर उसे यह विश्वास दिलाता है कि उसकी सारी उपलब्धियां केवल उसकी अपनी हैं। ऐसे में दूसरों के योगदान को पहचानना और उसके लिए हृदय से ‘धन्यवाद’ कहना विनम्रता का सर्वोच्च स्तर है।
यदि आपको धन्यवाद देना नहीं आता, तो इसका अभ्यास कीजिए। हम जिस भी विचार या भावना का बार-बार अभ्यास करते हैं, वह धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का स्थायी हिस्सा बन जाती है। ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ का सिद्धांत केवल कौशल पर ही नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं और सद्गुणों पर भी पूरी तरह लागू होता है।
इस निरंतर अभ्यास से चेतना का जो विकास होता है, वह एक क्रमिक और आध्यात्मिक यात्रा है। अपने प्रारंभिक चरण में व्यक्ति केवल एक जैविक ‘इंसान’ होता है, जो अपनी स्वार्थ-सिद्धि और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए जीता है। लेकिन जब वह सचेत अभ्यास के माध्यम से दया, प्रेम, सहानुभूति और कृतज्ञता सीख लेता है, तब वह सच्चा ‘मानव’ बनता है। वह समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने लगता है।
और अंततः, जब यही प्रेम, करुणा और कृतज्ञता किसी प्रयास की मोहताज न रहकर व्यक्ति का सहज स्वभाव बन जाती है, तब उसका प्रेम किसी एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित न रहकर पूरी सृष्टि के लिए हो जाता है। इसी अवस्था में वह अपनी जैविक सीमाओं को लांघकर ‘महामानव’ बन जाता है। बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह और गांधी जैसे व्यक्तित्व इसी निरंतर आत्म-परिष्कार और अभ्यास का ही परिणाम हैं।
ईश्वर हमें केवल जीवन रूपी कच्ची मिट्टी सौंपता है। उस मिट्टी को ज्ञान, सचेत अभ्यास और सकारात्मक भावनाओं के चाक पर रखकर एक साधारण इंसान से ‘महामानव’ की मूर्ति गढ़ने का पूरा उत्तरदायित्व केवल हमारा अपना है। जो इस सत्य को समझकर हर दिन कुछ बेहतर सीखने में जुट जाता है, वह जीवन के सर्वोच्च अर्थ को प्राप्त कर लेता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553

