मैं कोई धर्म गुरु नहीं, एक विचारक हूँ
परंपरागत रूप से धर्म गुरु अनुयायियों को चमत्कारों, कर्मकांडों और मान्यताओं के जाल में उलझाते हैं। वह प्रायः अनुयायियों को अपने ऊपर निर्भर बनाते हैं।
इसके विपरीत, एक विचारक का कार्य व्यक्ति को मानसिक रूप से स्वतंत्र करना है। वह व्यक्ति को स्वयं सोचने, समझने और अपने भीतर झांकने की दृष्टि देता है।
इस मार्ग पर कोई भी व्यक्ति अंधानुयायी या भक्त नहीं है, बल्कि एक जिज्ञासु और शोधकर्ता है जो जीवन के सत्य को स्वयं खोजना और जीना चाहता है।
मैं स्वर्ग, नरक और मृत्यु के बाद के प्रलोभनों का खंडन करता हूँ ! मानव जाति का एक बहुत बड़ा हिस्सा मृत्यु के बाद के काल्पनिक स्वर्ग की चाह और नरक के भय में अपना वर्तमान जीवन नष्ट कर देता है। मोक्ष या मुक्ति को मृत्यु के बाद मिलने वाले किसी भव्य पुरस्कार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
किंतु यथार्थ यह है कि जो व्यक्ति वर्तमान में दुखी, अशांत और उलझा हुआ है, उसे मृत्यु के बाद भी कोई शांति नहीं मिल सकती। असली नरक हमारी अशांत मानसिक अवस्था है और असली स्वर्ग इसी क्षण में पूर्ण संतुलन के साथ जीना है। पारलौकिक प्रलोभन केवल मनुष्य को उसके आज से भटकाते हैं।
मेरी दृष्टि में वृत्तियों का परिष्कार ही जीवन की असली साधना है ! मनुष्य का पूरा जीवन उसकी वृत्तियों (मन की गहरी आदतों, प्रवृत्तियों और स्वचालित प्रतिक्रियाओं) द्वारा संचालित होता है।
क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और भय, यह वृत्तियाँ ही हमें संसार के दुखों में बांधती हैं। जीने की सच्ची कला यह है कि हम सजग होकर अपनी इन वृत्तियों को देखें और उनका परिष्कार करें।
जब व्यक्ति अपनी वृत्तियों का स्वामी बन जाता है, तो वह बाहरी परिस्थितियों या लोगों के व्यवहार का गुलाम नहीं रहता। वह पूर्ण रूप से ‘स्व में स्थिर’ हो जाता है।
संसार में रहते हुए, संसार से अछूता रहना ही मुक्ति है ! मुक्ति का अर्थ घर-परिवार, समाज, प्रकृति या अपने कर्मों को छोड़कर किसी गुफा में भाग जाना नहीं है। वास्तविक मुक्ति यह है कि आप इसी संसार में रहें, अपने सभी दायित्वों का आनंदपूर्वक निर्वहन करें, किंतु मन पर किसी भी चीज़ का कोई बोझ न हो।
जैसे जल में कमल का पत्ता रहता है, जल से घिरा होने पर भी वह कभी भीगता नहीं है। इसी प्रकार, जब वृत्तियाँ शुद्ध हो जाती हैं, तो व्यक्ति संसार के कोलाहल के बीच रहते हुए भी भीतर से पूर्णतः शांत और मुक्त रहता है। यही ‘आज, अभी और इसी वक्त’ मुक्त होने की अवस्था है।
स्वयं को बदलने का आमंत्रण उन साहसी लोगों के लिए है जो कोरी मान्यताओं और भविष्य के सपनों से थक चुके हैं। जो किसी चमत्कार की भीख नहीं मांगते, बल्कि स्वयं के मन पर काम करने का संकल्प रखते हैं।
यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन को यथार्थ के धरातल पर बदलना चाहता है और चेतना के उच्च स्तर को इसी जन्म में पाना चाहता है, तो यह मार्ग उसी के लिए है। यह कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को प्राकृतिक और सहज रूप से जीने का विज्ञान है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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