नीलकंठ साधना का मर्म यही है कि जब तक हमारा अंतःकरण अतीत के मलबे और संसार की कड़वाहट से भरा हुआ होता है, तब हम उसमें परमात्मा का अमृत नहीं ले सकते हैं।
हम बाहर से कितने ही शांत और संयमित क्यों न दिखें, लेकिन भीतर अचेतन मन के तलघर में क्रोध, प्रतिशोध और हीन-भावना के बिच्छू रेंग रहे होते हैं, तब हमारी साधना केवल एक ऊपरी आवरण मात्र रह जाती है।
एक छोटा सा प्रतिकूल झोंका भी उस आवरण को हटा देता है और भीतर का सारा विष बाहर छलक जाता है।
शैव मार्ग पलायन का मार्ग नहीं है, यह रूपांतरण का मार्ग है। हम संसार को अपने अनुकूल नहीं बदल सकते; संसार में काँटे भी होंगे, निंदा भी होगी और विश्वासघात भी होगा।
लेकिन हम अपने कंठ और चित्त को इतना विशाल और समर्थवान अवश्य बना सकते हैं कि संसार का कोई भी विष हमारे भीतर प्रवेश करके हमें रोगी नहीं बना सकता है।
‘नीलकंठ मनोविज्ञान’ प्रत्येक शिक्षक और साधक के लिए एक अभेद्य कवच है।
जिस दिन आप दूसरों के व्यवहार की मानसिक यातना झेलना बंद कर देंगे और उसे अपने आत्म-सम्मान से जोड़ना बंद कर देंगे, उसी दिन आप देखेंगे कि आपके भीतर की आधी से अधिक पीड़ा स्वतः ही समाप्त हो गई है।
शैव ग्राम की “संस्कार चिकित्सा” की उपर्युक्त क्रियाएं आपके भीतर दबे हुए युगों के भार को उतार फेंकने का अमोघ अस्त्र हैं।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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