विश्व को विधर्म का मार्ग बौद्ध धर्मियों ने ही दिखलाया था ! : Yogesh Mishra

भगवान बुद्ध के समय के बाद भारत में हिन्दू एवं जैन, चीन में कन्फ्यूशियस तथा ईरान में जरथुस्त्र विचारधारा का बोलबाला था ! बाकी दुनिया ग्रीस को छोड़कर लगभग विचारशून्य ही थी ! ईसा मसीह के जन्म के पूर्व बौद्ध धर्म की गूंज जेरुशलम तक पहुंची थी और तप के नाम पर जब वहां के लोगों ने शासकों के संरक्षण में वहां के बौद्ध विहारों की अय्याशी देखी ! तब उनके भी मन में यह विचार आया कि मैं भी इसमें शामिल हो जाऊं ! किन्तु बौद्धों ने उन्हें बौद्ध विहारों में घुसने नहीं दिया !

तब वहां के क्षेत्रीय महत्वकांक्षी लोगों ने मिल कर एक नये धर्म की स्थापना की जिसे यहूदी धर्म कहा जाता है ! कुछ समय बाद इसमें संशोधन हुआ और न्यू टेस्टामेंट से उत्पन्न ईसाई धर्म नये रूप में योरोप में उदित हुआ ! फिर 600 साल बाद इस्लाम धर्म की उत्पत्ति हुई ! जो आज विश्व के बड़े धर्म हैं ! जो हिंदुत्व के लिये ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिये खतरा बन गये हैं !

ईसा पूर्व की 6ठी शताब्‍दी में ही बौद्ध धर्म का पूर्ण उत्‍थान हो चुका था ! दुनिया का सबसे पहला संगठित और सुव्यस्थित धर्म बौद्ध धर्म ही था ! कहना चाहिए कि पहली बार भगवान महावीर और बुद्ध ने धर्म को एक व्यवस्था दी थी ! बौद्ध धर्म को मगध नरेश महान सम्राट अशोक ने इसे पूरी दुनिया में फैलाने में मुख्‍य भूमिका निभाई थी ! अशोक महान के काल में ही बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं को लांघकर दुनिया के कोने-कोने में पहुंचना शुरू हो गया था ! चीन, श्रीलंका और सुदूर पूर्व में अशोक महान के शासनकाल में बौद्ध धर्म स्‍थापित हो चुका था, वहीं कुषाण शासक कनिष्‍क के काल में तो यह और द्रुत गति से स्‍थापित हुआ और संपूर्ण एशिया पर छा गया ! इतिहासकारों अनुसार अरब और मध्‍य एशिया में बौद्ध धर्म को स्‍थापित करने का श्रेय कनिष्‍क को ही जाता है !

कनिष्‍क के काल में चौथी और अंतिम बौद्ध परिषद हुई थी ! इस परिषद का उल्‍लेख ह्वेनसांग व तिब्‍बत निवासी तारानाथ ने अपनी पुस्‍तकों में किया है ! नागसेन व मिलिंद के प्रसिद्ध वार्तालाप से अनुमान होता है कि ग्रीक शासक मिनांडर जिसे बाद में मिलिंद कहा गया, ने बौद्ध धर्म स्‍वीकार कर लिया था ! इसके बाद तत्‍कालीन ग्रीक साम्राज्‍य भी बौद्ध धर्म के प्रभाव में आ गया था !

यानी बौद्ध धर्म भारत से चलकर पूर्व में तिब्‍बत, चीन, जापान, बर्मा, जावा, लंका और सुमात्रा तक फैला, जहां आज भी विद्यमान है, तो दूसरी ओर पश्चिम व मध्‍य एशिया से होते हुए अरब और ग्रीक तक फैल गया, जहां से आज वह मिट चुका है !

गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद उनकी मूर्तियां बनाने के दौर चला ! उनकी खड़ी आकृति के अलावा उनके जन्‍म-जन्‍मांतर की कथाओं वाली मूर्तियां पूरे पश्चिमी व मध्‍य एशिया में निर्मित हुईं ! इसमें मथुरा और गांधार शैली में विकसित और ईरानी कलाकारों द्वारा बनाई गई मूर्तियां अफगानिस्‍तान, ईरान और कहते हैं कि अरब के केंद्र मक्‍का तक विस्‍‍तृत होती चली गईं !

इसी तर्ज पर ईसाइयों ने क्रॉस निशान को अपना हथियार बनाया और पूरी दुनिया में क्रॉस की स्थापना करना शुरू कर दिया ! यह माना गया कि जिस भूमि पर क्रॉप स्थापित हो जाता है ! वह ईसाई समाज की भूमि है और इस तरह धीरे-धीरे और बहुत शांति के साथ उन्होंने यूरोप के हर महत्वपूर्ण बिल्डिंग पर और सार्वजनिक स्थान पर क्रॉस की स्थापना कर दी ! बाद को शासन सत्ता के सहयोग से और सैन्य शक्ति के बल से वहां के लोगों को विधिवत ईसाई बनाना शुरू कर दिया और यूरोप के अधिकांश देशों में ईसाई राजधर्म घोषित हो गया ! जिससे वहां की जनता को ईसाई धर्म अपनाना पड़ा ! जिसने नहीं अपनाया उसकी क्रूरता पूर्वक हत्या कर दी गयी !

कुषाण काल में गांधार व मथुरा कला से बुद्ध की मूर्ति निर्मित हो रही थी ! गांधार उत्‍तर-पश्चिमी में एक विशिष्‍ट क्षेत्र है जिसमें वर्तमान का रावलपिंडी, पेशावर और पूर्वी अफगानिस्‍तान का क्षेत्र आता है ! यहां निर्मित मूर्तियां पश्चिमी यूनानी प्रभाव वाली कला और देशी बौद्ध परंपराओं के मध्‍य संश्‍लेषण का परिणाम थी ! इसे ग्रीक-बौद्ध कला शैली भी कहा जाता है !

गांधार के कलाकार अपोलो के ग्रीक आदर्श से प्रेरित थे ! उसी शैली में भगवान बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण किया गया था ! वर्ष 2000 में अफगानिस्‍तान में कट्टरपंथी इस्लामिक तालिबान द्वारा बामियान में तोड़ी गई बुद्ध की सबसे विशालकाय मूर्ति गांधार शैली में ही निर्मित की गई थी ! यह ग्रीक-रोमन व भारतीय रूपों का अदभुत मिश्रण थी !

ऊपर के उदाहरणों से स्‍पष्‍ट है कि भारत से लेकर पश्चिम व मध्‍य एशिया और यूनान तक बौद्ध धर्म का स्थापित हो चुका था और ग्रीक-भारतीय शैली के मिश्रण से उत्‍पन्‍न गांधार शैली में महात्‍मा बुद्ध व बौद्ध परिवार की मूर्तियों का निर्माण किया गया था !

जिसे इस्लाम में बुत कहा गया और जो लोग इन बुतों की पूजा करते थे ! उन्हें इस्लाम में बुत परस्त कहा गया ! क्योंकि उस समय तक सार्वजनिक स्थानों पर बुद्ध या उनके देखा देखी हिन्दू धर्म के अन्य देवी देवताओं की मूर्ति स्थापित करके समाज का बहुत ही बुरी तरह से शोषण किया जा रहा था ! जिससे समाज के अंदर बहुत ही बड़े पैमाने में इन बुतपरस्तों के खिलाफ जन आक्रोश व्याप्त था !

अतः इस्लाम की स्थापना के साथ ही इन बुतों को तोड़ने की परंपरा भी शुरू हो गयी ! जिसे शुरुआत में तो सामाजिक आंदोलन माना गया लेकिन आगे चलकर उसे इस्लाम धर्म का हिस्सा मान लिया गया ! इसका असर यह हुआ कि इस्लाम जहां-जहां भी सशक्त हुआ ! वहां-वहां उसने पूरी तरह से बुत अर्थात मूर्तियों को नष्ट करना शुरू कर दिया ! फिर वह चाहे बुद्ध वह की हो या भगवान की या फिर कोई सामान्य कलाकृति ही क्यों न हो !

गुरुकुलों के तर्ज पर बौद्धकाल में विद्यालय की शिक्षा अपने चरमोत्कर्ष पर थी ! बौद्ध शिक्षा के लिये राजाओं द्वारा बड़े-बड़े महाविद्यालय बनवाये गये ! बौद्धकाल से हर्षवर्धन (6टी शताब्दी) के काल तक विश्व के लोग भारत में बौद्ध शिक्षा लेने के लिये आते थे ! किंतु रोम में रोमन कैथोलिक ईसाई धर्म और अरब में इस्लाम के उदय के बाद बौद्ध धर्म और शिक्षा दोनों ही पूरी दुनिया से नष्ट होने लगा ! जिसके शुरुआत की प्रेरणा कभी बौद्ध धर्म ही थी !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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