आवेग पर आश्रित धर्म : Yogesh Mishra

 वैसे कहने को तो धर्म स्थितप्रज्ञ होता है ! यह किसी भी देश, काल, परिस्थिति में अपने अस्तित्व को क्षीर्ण नहीं करता है !

 धर्म समाज को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए निरंतर प्रवाहित होने वाली ईश्वरीय व्यवस्था का प्रतिनिधि है !

 किंतु आज के इस डिजिटल युग में धर्म भी आवेग पर आश्रित हो गया है ! जब कभी धर्म के विषय पर कोई विवाद होता है, तो धर्म के अनुकरण करने वाले लोगों की संख्या मंदिरों में बढ़ जाती है  !

 साथ ही यह भी देखा जाता है कि जब धार्मिक विवाद बढ़ता है, तो धार्मिक ग्रंथों की विक्रय भी बढ़ जाती है !

 यह दोनों ही स्थितियां यह स्पष्ट करती है कि अब धर्म का व्यवस्थित अनुकरण नहीं हो रहा है और न ही हमारे धर्म गुरु अब इतने प्रभावशाली बचे हैं कि वह लोगों को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर सकें !

 अर्थात दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि किसी धर्म विशेष में पैदा होने मात्र से कोई व्यक्ति तब तक उस धर्म का अनुगामी नहीं बनता जब तक वह उस धर्म के सिद्धांतों को अपने जीवन में व्यवहार रूप में नहीं अपनाता है !

 यह अनुभव में आया है कि यदि कोई धर्म आवेग पर आश्रित हो तो स्पष्ट है कि अब उस धर्म की अवधि बहुत लंबी नहीं बची है !

 और धर्म को बचा कर रखना धर्म गुरुओं का ही नहीं समाज के हर व्यक्ति का भी कर्तव्य है क्योंकि यदि हम अपने धर्म की रक्षा नहीं करेंगे, तो धर्म हमारी रक्षा भी नहीं करेगा !

 महाभारत ग्रंथ में स्पष्ट रूप से लिखा है धर्मो रक्षति रक्षित: ! जिस श्लोक को पूर्ण रूप में इस प्रकार जानना चाहिये !

‘धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

अर्थात मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है ! इसलिए धर्म का हनन कभी मत करना, क्योंकि कहीं डर से मारा हुआ धर्म कहीं तुमको भी न मार डाले !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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