प्राय: देखा जाता है कि नौसीखिये तांत्रिक धन और यश की चाहत में एक के बाद एक कई तांत्रिक क्रियाओं को निरंतर करते रहते हैं !
परिणाम स्वरूप कुछ समय बाद उन तांत्रिकों के तांत्रिक क्रियाओं के मन अनुकूल स्पष्ट परिणाम मिलने बंद हो जाते हैं और परिणाम न मिलने के कारण लोग इस तरह के नौसीखिये तांत्रिकों से अपना पीछा छुड़ाने लगते हैं !
और इस जल्दबाजी से न ही वह तांत्रिक लंबे समय तक तंत्र क्रिया से धन ही कमा पाते हैं और न ही वह तांत्रिक यश ही प्राप्त कर पाते हैं !
अब प्रश्न यह खड़ा होता है कि दो तांत्रिक क्रियाओं के मध्य कितना अंतराल होना चाहिए ?
इस विषय में कुछ भी कहने से पहले यह जान लेना परम आवश्यक है कि तांत्रिक क्रिया है क्या ? यह स्पष्ट रूप से मानसिक तरंगों से उत्पन्न ऊर्जा से प्रकृति की व्यवस्था में हस्तक्षेप करने की प्रक्रिया है !
अर्थात सरल शब्दों में कहा जाये कि जब कोई तांत्रिक अपनी मानसिक शक्तियों को इतना अधिक विकसित कर लेता है कि वह प्रकृति के कार्य कारण की व्यवस्था में अपनी मानसिक तरंगों से हस्तक्षेप करने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है ! तब उसे सफल तांत्रिक माना जा सकता है !
क्योंकि मानसिक तरंगों से प्रकृति की व्यवस्था में हस्तक्षेप करने के बाद तांत्रिक और जिसके ऊपर तंत्र का प्रयोग किया गया है, वह दोनों के शरीरों में तीव्र रसायनिक परिवर्तन होते हैं और यह तीव्र रसायनिक परिवर्तन पूरे के पूरे शारीरिक और मानसिक संरचना को प्रभावित करते हैं !
ऐसी स्थिति में जब कोई तांत्रिक एक बार सफल तांत्रिक प्रयोग कर लेता है, तब उसे दोबारा दूसरी तांत्रिक क्रिया को करने के पहले कम से कम 40 दिन का अंतराल अवश्य रखना चाहिए !
क्योंकि प्रत्येक 40 दिन के अंतराल पर हमारे शरीर के अंदर के रसायन और कोशिकाएं प्राकृतिक अवस्था में बदल जाती हैं !
अतः 40 दिन के अंतराल के बाद जब हम पुनः तांत्रिक प्रयोग करते हैं तो पुरानी कोशिकाओं के परिवर्तित हो जाने के कारण हम नई तांत्रिक प्रक्रिया में पुनः सफलता प्राप्त कर लेते हैं ! अन्यथा अपयश ही हांथ लगता है !
ऐसा मैंने अपने निजी जीवन के अनुभव में भी पाया है !
जो तांत्रिक इस तरह के अंतराल की प्रक्रिया को अपनाएं बिना तांत्रिक क्रिया करते हैं, उनके शरीर में बार-बार कोशिकाओं के परिवर्तन और रासायनिक परिवर्तनों के कारण उन्हें कुछ समय बाद गंभीर बीमारियां हो जाती हैं ! जिन का इलाज इस इस आधुनिक चिकित्सा जगत के पास भी नहीं है !
इसी कारण प्रायः तांत्रिकों का वृद्धा अवस्था का जीवन बहुत ही कष्टदायक होता है !
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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