शैवों में लकुलीश का महत्व

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि शैव और वैष्णव की संस्कृतियों का संघर्ष पिछले 10,000 वर्षों से इस पृथ्वी पर चल रहा है ! जिसमें अनेक बार वैष्णव आक्रांताओं का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया कि शैवों को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इधर-उधर छिप कर रहना पड़ा !

किंतु साथ ही भगवान शिव का आशीर्वाद लेकर समय-समय पर बहुत से शैव जीवन शैली के पुनरुत्थानवादी प्रकट हुए ! और उन्होंने समाज को नई दिशा दी ! जिसमें एक नाम भगवान लकुलीश का भी है !

भगवान लकुलीश, भगवान शिव के 24वें अवतार माने जाते हैं ! इन्होंने पाशुपत शैव धर्म की स्थापना की थी ! लकुलीश को शैव धर्म के प्रमुख पुनरुत्थानवादियों में गिना जाता है !

इनका जन्म दूसरी शताब्दी में बड़ौदा के दभोई जिले में हुआ था । यह लिंग उपासक थे ! इनका मत था कि इस सृष्टि का आधार लिंग और योनि है ! क्योंकि यही प्रजनन का आधार है जिससे सृष्टि में जीव जन्म लेकर अपना अपना प्रशिक्षण काल पूरा करते हैं और अपना विकास करते हैं ! यदि लिंग और योनि न हो तो सृष्टि में जीव का जीवन क्रम ही समाप्त हो जायेगा !

अत: यह लिंग उपासना के प्रवाल समर्थक थे ! इनका मानना था कि सृष्टि क्रम में सभी जीवों में मात्र मनुष्य ही है, जो वैष्णव के गलत जीवन शैली के कारण अपने लिंग और योनि को संसार से छिपता है, जो कि एकदम गलत है ! क्योंकि यही सृष्टि का आधार है !

पाशुपत सूत्र, पाशुपत संप्रदाय की मूल विचारधारा का एक अति प्राचीन ग्रन्थ है ! जो अब भी संस्कृत भाषा में प्राचीन पाठ के रूप में उपलब्ध है।

यह ग्रन्थ लकुलीश द्वारा लिखा गया माना जाता है ! जो शिव के सर्वोच्च रूप, पशुपति की आराधना और उपासना के सिद्धांतों को दर्शाता है। इसमें पाशुपत योग, कर्मकांड और साधना के नियमों का वर्णन है, जो शिव के साथ एकीकरण और मोक्ष प्राप्ति के सूत्र के रूप में जाने जाते हैं !

यह अति गुप्त और विशेष साधना पध्यति है ! नेपाल स्थित पशुपतिनाथ मंदिर कभी इस उपासना का गढ़ रहा है !!

इस हेतु इनकी उपासना स्थलों पर नग्न मूर्तियाँ ही सर्वाधिक मिलती हैं ! कई कत्यूरी शासकों ने अनेकों स्थान पर इनके मंदिर बनवाये थे !

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