आज के इस आधुनिक युग में मानवता के लिए जो सबसे बड़ा खतरा है, वह है संवाद विहीन समाज !
और इस संवाद विहीन समाज के लिए कोई एक घटक जिम्मेदार नहीं है, व्यक्ति के जीवन की बहुत सी घटनाएं मिलकर व्यक्ति को संवाद विहीन बनाती हैं !
बचपन में बच्चे की जब खेलने कूदने, चीखने चिल्लाने की उम्र होती है, तब माता-पिता शिक्षा के नाम पर बच्चों को स्कूल की चार दिवारियों में कैद कर देते हैं !
जहां अनुशासन के नाम पर बच्चे के मूल संवाद की वृत्ति को ही खत्म कर दिया जाता है और बच्चा धीरे-धीरे अपने को अभिव्यक्त करने में ही शर्म महसूस करने लगता है !
यह स्कूल शिक्षा के नाम पर अनुशासन की जकड़ इतनी गहरी होती है कि संवाद विहीनता आजीवन व्यक्ति का स्वभाव बन जाता है, और व्यक्ति स्कूल की शिक्षा पूरी कर लेने के बाद भी अपने को समाज में प्रस्तुत नहीं कर पता है !
स्कूल के बाद कॉलेज की पढ़ाई में कैंपस सिलेक्शन की होड़ व्यक्ति को “मुक छात्र” के अलावा और कुछ नहीं बनने देता है !
और व्यक्ति कॉलेज के साथ ही यदि नौकरी पाया जाता है, तो कॉरपोरेट जगत का अनुशासन उसे संवाद विहीन बना देता है !
क्योंकि व्यक्ति को सदैव यह लगता है कि यदि वह अपने ऑफिस में अधिक संवाद करेगा, तो उसकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी और नौकरी खतरे में पड़ते ही जो उसने कर्ज पर मकान और गाड़ी ले रखी है, उसकी किस्त वह नहीं दे पाएगा !
कहीं नौकरी खतरे में न पड़ जाये इस भय से व्यक्ति पूरे जीवन भर संवाद विहीन अवस्था में ही नौकरी करता रहता है !
और धीरे-धीरे बढ़ती आयु के साथ व्यक्ति समाज में संवाद करने के आत्मविश्वास को खो देता है और यह आत्मविश्वास विहीन व्यक्ति समाज की विकृतियों का विरोध करना बंद कर देता है !
परिणामत: विरोध न होने के कारण समाज निरंकुश और गंदा होता चला जाता है, तब निरंकुश मानसिकता के लोग खुले आम समाज का शोषण शुरू कर देते हैं और धीरे-धीरे संवाद विहीनता के कारण समाज में अपराध बढ़ जाता है और सामाजिक संरचना टूट जाती है !
इसलिए यह हमारा कर्तव्य है कि हमें अपनी आत्मरक्षा के लिए समाज में निरंतर संवाद को बनाए रखना चाहिए अन्यथा समाज ही नहीं हम भी नष्ट हो जाएंगे !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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