संपन्नता का महाविज्ञान
विशेष सत्र संपन्न होना एक कला है ! जो लोग संपन्न होने की युक्ति को नहीं जानते हैं, वह निश्चित रूप से योग्य और शिक्षित होने के बाद भी परिश्रम करके गरीबी ही रह जाते हैं ! अर्थात मेरे कहने…
विशेष सत्र संपन्न होना एक कला है ! जो लोग संपन्न होने की युक्ति को नहीं जानते हैं, वह निश्चित रूप से योग्य और शिक्षित होने के बाद भी परिश्रम करके गरीबी ही रह जाते हैं ! अर्थात मेरे कहने…
भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवत गीता के छंठे अध्याय के अठारहवे श्लोक में कहा है कि – यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते !! निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥ 6/18 अर्थात्- जब (यदा), विशेष रूप से संयत किया हुआ (विनियतं), चित्त (चित्तम्),…
भगवान शिव द्वारा रावण को परा-अपरा विद्या के सत्य के रहस्य को बतलाने के लिये जो सूत्र स्वयं दिये गये थे ! जिनसे वैष्णव लेखकों ने 100 से अधिक ग्रंथों का निर्माण किया है ! उन्हीं सूत्रों की व्याख्या पर…
शैव जीवन शैली में मुक्ति की प्राप्ति के लिये भगवान शिव द्वारा रावण को जो तत्वज्ञान दिया गया था, जिससे रावण प्रकांड ब्राह्मण ही नहीं बना बल्कि उसने परम मुक्ति की अवस्था में अमृत्व को भी प्राप्त कर लिया था…
शिव सहस्त्रार ज्ञान साधना स्वयं में संपूर्ण साधना है ! इस साधना को करने वाले मानव साधक को अपने कल्याण के लिये किसी भी अन्य सहयोगी साधना पद्धति की आवश्यकता नहीं है ! यह ज्ञान परंपरा मनुष्य का कल्याण इस…
आत्म कल्याण की इच्छा से अपने पितामह ब्रह्मा जी का अनन्य तप करने के बाद भी जब रावण को वेदों का ज्ञान तो प्राप्त हो गया किन्तु आत्म संतुष्टि नहीं हुई ! तब रावण ने भगवान शिव की आराधना करने…
शिव सहस्त्रार एक तमिल भाषा में श्रुति और स्मृति के आधार पर संग्रहित किया गया ऐसा ग्रंथ है, जो राम रावण युद्ध के बाद विलुप्त हो गया ! लेकिन इसका बहुत बड़ा अंश तमिल लोकगीतों में बहुत समय तक चर्चा…
अंग्रेजों द्वारा स्थापित किये गये स्कूलों का एक मात्र उद्देश्य था कि अंग्रेज सरकार के लिए बौद्धिक मजदूर पैदा करना ! जिनसे अंग्रेज कानून, तकनीक, प्रशासन सेवा और चिकित्सा के क्षेत्र में अपने लाभ के लिये कार्य ले सकें !…
मनोवैज्ञानिकों की अवधारणा है कि कोई भी व्यक्ति यदि निरंतर एक ही समय पर 40 दिन तक कोई भी क्रिया करता है, तो उस मनुष्य के अंदर उस क्रिया को निरंतर करते रहने का अभ्यास हो जाता है ! जिसे…
आपरिपक्व वैष्णव लेखकों का मत है कि कलयुग में व्यक्ति की बुद्धि और सामर्थ्य कम हो जाने के कारण व्यक्ति मात्र भक्ति के द्वारा ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है ! यह दर्शन या विचारधारा पूरी तरह से अपूर्ण…