Category Adhyatm

Your blog category

मैं शिष्य क्यों नहीं बनाता हूँ

मानवीय चेतना और मनोविज्ञान की गहराइयों में उतरने पर मैंने किसी को भी बिना तैय्यारी के शिष्य नहीं बनाने का निर्णय लिया है, यह शिष्य न बनाने का निर्णय किसी अहंकार का नहीं, बल्कि मानव मन की जटिलताओं और उसकी…

मुझे कथावाचकों से बचाओ

आज जन्माष्टमी है, आज रात्रि भगवान श्रीकृष्ण का पूजन आदि करके प्रसाद लेकर मैं विश्राम कर ही रहा था कि मुझे स्वप्न में लगा जैसे भगवान श्रीकृष्ण मेरे स्वप्न में आये हैं, वह बहुत दुखी हैं और कह रहे हैं…

मुक्ति की कामना से बड़ी मुर्खता कोई नहीं है

केवल अपने दुखों और संघर्षों से घबराकर आत्म सुधार की जगह जन्म-मरण से मुक्ति की चाह रखना एक प्रकार का मानसिक पलायन ही है। ईश्वर का आदर्श और अवतार का मर्म समझे बिना इस तरह की कामना करना मानसिक रोग…

मुक्ति की अवधारण मानसिक रोगियों की सोच है

मध्यकाल से लेकर आधुनिक युग तक, धर्म गुरुओं और सांप्रदायिक व्याख्याकारों ने मोक्ष की जो स्वार्थी और पलायनवादी धारणा गढ़ी, उसने संपूर्ण समाज की ऊर्जा को कुंठित कर दिया। जब मुक्ति को संसार से भागकर जंगलों या आश्रमों में छिपने…

मन की असीम शांति और स्थिरता के योग

विचलित मन जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है, और ज्ञान से प्रकाशित स्थिर मन असीम आनंद का द्वार है। संसार में मनुष्य की सबसे बड़ी खोज भौतिक संपदा नहीं, बल्कि मानसिक शांति है। वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को हमारे मन,…

भारत का धर्म व्यवसाय ही भारत के विकास में बाधा है

जब समाज को केवल चमत्कारों, पौराणिक कथाओं और कर्मकांडों में उलझा कर रखा जाता है, तो वहां वैज्ञानिक सोच और सवाल पूछने की प्रवृत्ति का विकास धीमा हो जाता है। किसी भी आधुनिक राष्ट्र के विकास के लिए विज्ञान, तकनीक…

भविष्य पीढ़ी का धर्म “परम मुक्ति” होगा

भविष्य में विज्ञान और तर्क, पारंपरिक अर्थों वाले ‘धर्म’ के सहयात्री नहीं होंगे, बल्कि वे एक परिष्कृत और अनुभवजन्य आध्यात्मिकता के सहयात्री बनेंगे। जब धर्म से कर्मकांड, पौराणिक कथाएं और अंधविश्वास छंट जाएंगे, तो जो शेष बचेगा वह मानव चेतना,…

भविष्य का तीर्थ होगा शैव ग्राम

मेरा यह मत है कि भविष्य की पीढ़ियां ‘धर्म’ शब्द के उस कर्मकांडीय और अवैज्ञानिक पारलौकिक सुख के महत्व को पूरी तरह त्याग देंगी, जिसे आज हम अपनाये हुये हैं। इसके बजाय, धर्म अपने मूल स्वाभाविक अर्थ लोक कल्याण, महाकल्याण…

भगवानवाद से बड़ा धोखा कोई नहीं है

भगवान और अवतारवाद की अवधारणा ने भारतीय समाज को विकलांग कर दिया ! विकृत आस्था से भविष्य का भटकाव और अकर्मण्यता की उत्पत्ति हुई है ! प्रत्येक देश की आत्मा उस देश के दर्शन में बसती है, लेकिन क्या हमारा…

भगवान की नहीं शरीर की पूजा कीजिये

भारतीय दर्शन में भी महर्षि कालिदास ने कहा है कि “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”, अर्थात शरीर ही सभी कर्तव्यों और धर्मों को पूरा करने का प्रथम साधन है। बिना स्वस्थ शरीर के न तो संसार का आनंद लिया जा सकता है,…