शैवों को तर्पण की आवश्यकता क्यों नहीं है

सभी समाज में जीने के दो तरीके हैं, एक वैष्णव और दूसरा शैव जीवन शैली ! समाज को एक सुव्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए वैष्णव ने संचय, गृहस्थ और पितृ तर्पण को नितांत आवश्यक कर्म कहा है, क्योंकि यह…

सभी समाज में जीने के दो तरीके हैं, एक वैष्णव और दूसरा शैव जीवन शैली ! समाज को एक सुव्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए वैष्णव ने संचय, गृहस्थ और पितृ तर्पण को नितांत आवश्यक कर्म कहा है, क्योंकि यह…

शैव समाज लोगों के एक ऐसे समूह या समुदाय को कहते हैं, जो एक साथ रहते हैं और अपनी संपत्ति, संसाधनों, आय और जिम्मेदारियों को आपस में साझा करते हैं। इस व्यवस्था में व्यक्तिगत (निजी) संपत्ति की बजाय सामूहिक संपत्ति…

भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं में ‘शैव ग्राम’ केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना के उच्च आयाम को छूने का एक जीवंत केंद्र है। यहाँ की हर एक शिला और हर एक मार्ग में गुरुदेव के दिव्य विचार और…

कंक्रीट के दमघोंटू जंगल से दूर, मानवता की आत्मिक शांति और मुक्ति के लिए निर्मित ‘शैव ग्राम’ 12 एकड़ में विस्तृत एक दिव्य तपोवन है। इसे साक्षात ‘ईश्वर के घर’ के रूप में गढ़ा गया है, जहाँ प्रकृति और मौन…

कंक्रीट के दमघोंटू जंगल से दूर, मानवता की आत्मिक शांति और मुक्ति के लिए निर्मित ‘शैव ग्राम’ 12 एकड़ में विस्तृत एक दिव्य तपोवन है। इसे साक्षात ‘ईश्वर के घर’ के रूप में गढ़ा गया है, जहाँ प्रकृति और मौन…

सद्गुरु का मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि सत्य बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है। यह आध्यात्मिक ऊर्जा का एक ‘अदृश्य’ जगत है, जहाँ कोई भी सहजता से गुरु का चोला पहनकर दुकान खोल सकता है। इसीलिये…

आज विश्व जिन गहरे संकटों, मानसिक संताप और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है, उसका मूल कारण हमारी वह भूल है जिसमें हमने ब्रह्मांड को उसका हक़ देना बंद कर दिया है। प्राचीन सनातन व्यवस्था में अपनी आय का दसवां…

किसी भी सामान्य व्यक्ति को वैश्विक ख्याति प्राप्त सन्त बनने के लिये 6 चरण में कार्य करना पड़ता है ! पहला चरण मूल विचार और विशिष्ट छवि का निर्माण: सामान्य व्यक्ति आध्यात्मिक की पहचान केवल कर्मकांड तक सीमित न रखकर,…

तेज और प्रज्ञा के मिलन से ही वह स्वतंत्र विचार उत्पन्न होता है, जो मनुष्य को भीड़ से निकालकर एक श्रेष्ठ विचारक बनाता है, उसके कुछ विशेष ग्रहीय योग होते हैं । वैदिक ज्योतिष में सूर्य को हमारी आत्मा, प्राण…

सफलता और अजेयता का आंतरिक विज्ञान संसार में स्थायी सफलता केवल धन, भूमि या बाहरी संसाधनों की मोहताज नहीं होती। राज ऋषि विद्या यह सिद्ध करती है कि किसी भी परिस्थिति के प्रति हमारी ‘आंतरिक प्रतिक्रिया’ ही हमारे उत्थान या…