yogeshmishralaw

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स्वयं को बदलने का आमंत्रण

मैं कोई धर्म गुरु नहीं, एक विचारक हूँ परंपरागत रूप से धर्म गुरु अनुयायियों को चमत्कारों, कर्मकांडों और मान्यताओं के जाल में उलझाते हैं। वह प्रायः अनुयायियों को अपने ऊपर निर्भर बनाते हैं। इसके विपरीत, एक विचारक का कार्य व्यक्ति…

सुरक्षित भविष्य के लिये परंपरागत पढ़ाई आज ही छोड़ दो

वर्तमान विद्यालयों की नींव 18 वीं और 19 वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के दौरान रखी गई थी। उस समय समाज को विचारशील मनुष्यों की नहीं, बल्कि कारखानों में काम करने वाले आज्ञाकारी मजदूरों की आवश्यकता थी। एक जैसी वेशभूषा…

सामान्य मानव से महामानव की यात्रा

यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि ईश्वर या प्रकृति मनुष्य को केवल मूलभूत शारीरिक आवश्यकताओं के साथ इस दुनिया में भेजती है। जब कोई शिशु जन्म लेता है, तो उसकी चेतना केवल भूख, प्यास, नींद और सुरक्षा जैसी जैविक जरूरतों…

समाज से बच कर रहो

दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह कोई राजनीतिक शासक या क्रूर सरकार नहीं, बल्कि हमारा अपना ‘विकृत चित्त समाज’ है। जिसे “सामाजिक तानाशाही” नाम दिया जा सकता है। यह एक ऐसा अदृश्य पिंजरा है, जो बिना किसी तार्किक आधार के, केवल…

सफल व्यक्ति में संत खोजने की नासमझी

सफल व्यक्ति में संत खोजने की नासमझी संसार के हर देश की अपनी एक अलग तासीर है, अपना एक अलग मनोविज्ञान है। किंतु भारत के जनमानस की सोच सबसे विचित्र और गहरे अंतर्विरोधों से घिरी हुई है। यहाँ के आम…

संसार में रस और मुक्ति की इच्छा दोनों एक साथ ईश्वर को पसंद नहीं है

संसार के भोगों में आसक्ति और मुक्ति की कामना, यह दोनों प्रवृत्तियां एक-दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं, जैसे पूर्व और पश्चिम दिशा। एक ही समय में इन दोनों की इच्छा करना आध्यात्मिक मार्ग पर एक गहरा विरोधाभास है ! मुक्ति…

संसार प्रवृत्ति से निवृत्ति की यात्रा है

भारतीय दर्शन और सनातन परम्परा में ‘संसार’ केवल एक भौतिक स्थान नहीं है, बल्कि यह आत्मा के क्रमिक विकास की एक प्रयोगशाला है। मानव जीवन का चरम लक्ष्य इसी संसार में रहते हुए पूर्णता को प्राप्त करना है। वेदों और…

संतों को वैश्विक ख्याति कैसे बनाया जाता है

किसी भी संत को वैश्विक ख्याति प्राप्त महापुरुष के रूप में स्थापित करने के लिए एक सुनियोजित योजना और रणनीति की आवश्यकता होती है ! जिसे जन सम्पर्क योजना या मार्केटिंग कह सकते हैं ! किसी संत की पहचान केवल…

शैवों को तर्पण की आवश्यकता क्यों नहीं है

सभी समाज में जीने के दो तरीके हैं, एक वैष्णव और दूसरा शैव जीवन शैली ! समाज को एक सुव्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए वैष्णव ने संचय, गृहस्थ और पितृ तर्पण को नितांत आवश्यक कर्म कहा है, क्योंकि यह…

शैव समाज क्या है

शैव समाज लोगों के एक ऐसे समूह या समुदाय को कहते हैं, जो एक साथ रहते हैं और अपनी संपत्ति, संसाधनों, आय और जिम्मेदारियों को आपस में साझा करते हैं। इस व्यवस्था में व्यक्तिगत (निजी) संपत्ति की बजाय सामूहिक संपत्ति…