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कर्म को कर्म ही समझिए, समस्या नहीं

जीवन में हम अक्सर अपने छोटे-बड़े कार्यों और जिम्मेदारियों को अपने सिर का भारी बोझ या एक गंभीर ‘समस्या’ मान लेते हैं। जैसे ही हम किसी काम को समस्या के रूप में देखना शुरू करते हैं, हमारे भीतर मानसिक तनाव,…

उच्च चेतना के सहयोगी समाज में बिखरे हुये क्यों होते हैं

प्रकृति का यह एक अटल नियम है कि कोई भी युगान्तकारी संकल्प एकाकी सिद्ध नहीं होता। जब कोई उच्च चेतना किसी महान लोक-कल्याणकारी प्रयोजन के लिए धरती पर अवतरित होती है, तो वह कभी अकेली नहीं आती है, बल्कि  उसके…

उच्च चेतना के व्यक्ति की सांसारिक निर्लिप्तता और आत्मनिर्भरता

उच्च चेतना से युक्त व्यक्ति का जीवन संसार रूपी सरोवर में खिले उस कमल के समान होता है, जो जल में रहते हुए भी उससे अछूता रहता है। ऐसी मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त मनुष्य भौतिक संसार का त्याग…

उच्च चेतना के व्यक्ति की पहचान

मनुष्य का अस्तित्व केवल हाड़-मांस के शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह चेतना के विभिन्न स्तरों पर जीता है। सामान्य मानवीय जीवन प्रायः दो ध्रुवों के बीच डोलता रहता है, ‘बुद्धि’ और ‘भावना’। बुद्धि का क्षेत्र तर्क, गणना और…

उच्च चेतना के व्यक्ति की टीम में जुड़ना कठिन क्यों होता है

उच्च चेतना के किसी भी महान संकल्प से जुड़ी कोर टीम का निर्माण किसी सामान्य सांसारिक प्रक्रिया या औपचारिक साक्षात्कार से नहीं होता है। वास्तव में, इस समूह का हिस्सा बनना सामान्य व्यक्तियों के लिए अत्यंत कठिन होता है, क्योंकि…

उच्च चेतना के व्यक्ति का जन्म प्रारब्ध नहीं. संकल्प है

संसार में देह धारण करने की प्रक्रिया के पीछे दो सर्वथा भिन्न आध्यात्मिक नियम कार्य करते हैं, एक है ‘प्रारब्ध की विवशता’ और दूसरा है ‘संकल्प का क्रियान्वयन’। सामान्य मनुष्य का जन्म उसके पूर्वजन्मों के संचित कर्मों के उस हिस्से…

उच्च चेतना के व्यक्ति का अंतर्ज्ञान और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ाव

उच्च चेतना को प्राप्त व्यक्ति का जीवन केवल बुद्धि, तर्क और किताबी पोथियों की संकीर्ण सीमाओं में नहीं बंधता है। साधारण मनुष्य जहाँ हर निर्णय के लिए मस्तिष्क की सीमित गणनाओं और पूर्व-संग्रहित जानकारियों पर निर्भर रहता है, वहीं उच्च…

उच्च चेतना का नीलकंठ स्वरूप

जब भी कोई उच्च चेतना संसार में किसी युगांतकारी परिवर्तन या सत्य की स्थापना का संकल्प लेकर उतरती है, तो स्थापित स्वार्थों और जड़ व्यवस्थाओं द्वारा उसका विरोध होना स्वाभाविक है। समुद्र मंथन के समय भी अमृत से पहले कालकूट…

आपदा में उदय की ग्रह व्यवस्था

जिस प्रकार सघन अंधकार ही भोर के प्रथम प्रकाश को जन्म देता है, उसी प्रकार मनुष्य की विपदाएं और उसकी कमजोरियां ही उसके वास्तविक उदय का मार्ग प्रशस्त करती हैं। वैदिक ज्योतिष में जन्म कुण्डली के छठे, आठवें और बारहवें…

आपके जीवन का दिशा-सूचक ग्रह

शरीर और चेतना का प्रथम मिलन बिंदु है लग्न, और लग्नेश का बल ही मनुष्य को आपदा से निकालकर उसके वास्तविक उदय का मार्ग प्रशस्त करता है। वैदिक ज्योतिष में ‘लग्न’ का अर्थ है मनुष्य का अपना शरीर, उसका स्वभाव,…