संवाद विहीन समाज मानवता के लिये बड़ा खतरा

आज के इस आधुनिक युग में मानवता के लिए जो सबसे बड़ा खतरा है, वह है संवाद विहीन समाज ! और इस संवाद विहीन समाज के लिए कोई एक घटक जिम्मेदार नहीं है, व्यक्ति के जीवन की बहुत सी घटनाएं…

आज के इस आधुनिक युग में मानवता के लिए जो सबसे बड़ा खतरा है, वह है संवाद विहीन समाज ! और इस संवाद विहीन समाज के लिए कोई एक घटक जिम्मेदार नहीं है, व्यक्ति के जीवन की बहुत सी घटनाएं…

जिस तरह पढ़ाई में रुचि न लेने वाले बच्चे प्राय: स्कूल से भाग कर इधर-उधर अपना समय बर्बाद करते हैं या कहिये कि वह समय ही नहीं बल्कि अपना जीवन बर्बाद करते हैं ! ठीक उसी तरह यह संसार जो…
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि शैव और वैष्णव की संस्कृतियों का संघर्ष पिछले 10,000 वर्षों से इस पृथ्वी पर चल रहा है ! जिसमें अनेक बार वैष्णव आक्रांताओं का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया कि शैवों को अपने…

प्राय: मृत्यु का तात्पर्य यह माना जाता है कि एक व्यक्ति के पिंड की अवधि पूरी हो गई और उसकी चेतना ने नया पिंड धारण करने के लिए इस पिंड को त्याग दिया ! किंतु पिंड को त्याग देने के…

वैष्णव जीवन शैली में यह अवधारणा है कि यदि कोई व्यक्ति अपने भाग्य के दुखद क्षणों को बदलना चाहता है, तो उसे भगवान की भक्ति करनी चाहिए ! क्योंकि भगवान ही किसी व्यक्ति के भाग्य को बदल सकते हैं !…

पूरे विश्व में एक मात्र शैव जीवन शैली ही है, जो संपूर्ण विश्व में मानवता की रक्षा कर सकती है, अन्यथा अन्य जीवन शैलियां तो मनुष्य का सर्वनाश कर ही रही हैं ! दूसरे शब्दों में मात्र शैव जीवन शैली…

शैव साधक की दिनचर्या वैष्णव साधकों से एकदम अलग होती है ! वैष्णव दूसरों मनुष्यों के बनाये नियम से जीते हैं जबकि शैव साधक प्रकृति का अनुकरण करते हैं ! शैवों के अनुसार यह पिण्ड शरीर ईश्वर का दिया वरदान…

मात्र शैव ही जीवन चक्र के समस्त वर्तुल को समझ सकता है । क्योंकि उसके इष्ट शिव ही सृष्टि चक्र के सृजन, पालन और संहार चक्र को नियंत्रित करते हैं। शिव ही ज्ञान और योग के अनादि स्रोत हैं ।…
इस विषय को एक उदाहरण से समझाता हूँ ! एक व्यक्ति के पास उसे अति प्राचीन एक पांडुलिपि मिली ! उस व्यक्ति ने जब उस पांडुलिपि का गहराई से अध्ययन किया तो उसे पता चला कि उसमें सोना बनाने का…

भगवान, देवता, दैत्य, दानव, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्न, यक्ष, किन्नर आदि सभी पिण्ड धारी या अपिण्डीय सभी ऊर्जा रूप में शिव का ही अंश हैं ! सब एक ही हैं जो अपने जन्म जन्मान्तर की वृत्ति और प्रवृत्ति…