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सुख और दुःख से मुक्त कौन है : Yogesh Mishra

इस प्रश्न का उत्तर स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवदगीता दूसरे अध्याय के श्लोक 14,15 और 16 में दिया है ! भगवान व्याकुल अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन कर्तव्य-निर्वाह करते हुए मनुष्य को सुख तथा दुःख के…

सामाजिक जीवन में पारदर्शिता का महत्व : Yogesh Mishra

जब व्यक्ति सामाजिक जीवन जीने का निर्णय लेता है, तब उसके जीवन में निजीता जैसी कोई चीज नहीं रह जाती है ! व्यक्ति के हर कृत्य का विश्लेषण समाज करने लगता है और इस विश्लेषण के आधार पर ही समाज…

सर्वे भवंतु सुखिनः

 यदि आप सामान्य मनुष्य की तरह जीवन जीकर नहीं मरना चाहते हैं, बल्कि आत्म कल्याण के साथ लोक कल्याण की कामना भी रखते हैं ! तो आपके लिए सनातन ज्ञान पीठ एकदम सही जगह है !  सनातन ज्ञान पीठ एक…

संपन्नता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है : Yogesh Mishra

 समाज में संपन्नता पूर्वक जीवन निर्वहन करने के लिए कुछ व्यावहारिक युक्तियां होती हैं !  जिन्हें किसी भी शिक्षण संस्थान के किसी भी पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ाया जाता है ! जिसकी जानकारी के अभाव में मनुष्य पूरे जीवन आर्थिक संघर्ष…

संपन्नता मनुष्य का एक स्वभाव है : Yogesh Mishra

जैसे कोई व्यक्ति स्वभाव से ही लापरवाह होता है और कोई दूसरा व्यक्ति अपने कार्य के प्रति बहुत सजग होता है, इसी तरह कुछ लोग स्वभाव से ही समय बर्बाद करते हैं और कुछ लोग समय को लेकर बहुत सजग…

संपन्नता एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है : Yogesh Mishra

संपन्नता एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का परिणाम है ! जिस तरह किसी वृक्ष से फल को प्राप्त करने के लिए उस वृक्ष को निरंतर पोषित करना पड़ता है ! ठीक उसी तरह व्यक्ति को संपन्न बनाने के लिए अपने…

संपन्न होना है तो ज्योतिषियों से दूर रहो : Yogesh Mishra

किसी भी व्यक्ति के जीवन में ज्योतिषी की भूमिका मात्र इतनी ही है कि वह उसे भविष्य में होने वाली घटनाओं की ग्रह गणना के अनुसार एक अनुमानित परिस्थितियों की सूचना देता है ! लेकिन इस सटीक सूचना को देने…

संपन्न होना है तो कथावचकों से दूर रहो : Yogesh Mishra

 भाग्यवादी आदमी कभी भी पुरुषार्थवान नहीं हो सकता है और कथावाचक व्यक्ति को ईश्वरवादी कम भाग्यवादी अधिक बना देते हैं !  जो लोग बहुत भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिये बहुत अधिक कथा आदि सुनते हैं, उनकी दृष्टि इस…

क्या “श्री” अर्थात लोभी व्यक्ति : Yogesh Mishra

श्री शब्द का सबसे पहले ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है ! अनेक धर्म पुस्तकों में लिखा गया है कि ‘श्री’ शक्ति का सूचक है ! श्री अर्थात जिस व्यक्ति में विकास करने की और खोज की शक्ति होती है !…

शैवों में पीठ की ऊर्जा कैसे काम करती है : Yogesh Mishra

वैष्णव परंपरा में समाज को नियंत्रित करने के लिए जो पीठों की स्थापना की जाती है, वह बाह्य आडंबर पर आश्रित होती है ! इसी परंपरा के अनुपालन में आज से कुछ समय पूर्व कुछ विकृत मानसिकता के तथाकथित शैवों…