yogeshmishralaw

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ब्रह्मास्मि मुद्रा तंत्र और सामान्य मुद्रा तंत्र में अंतर

हमारे हाथ के अंदर 14 स्थान पर विशेष मर्म बिंदु होते हैं और समस्त शरीर में 107 मर्म बिंदु होते हैं ! जिन्हें तंत्र के जानकार अलग-अलग मुद्रा को स्थापित करके उन बिंदुओं से शरीर में ऊर्जा के प्रवाह को…

बौद्धिक संपदा एक भ्रम

पश्चिम की भोगवादी संस्कृति ने आज बौद्धिक संपदा की परिभाषा ही बदल दी है ! पश्चिमी जगत के अनुसार बौद्धिक संपदा प्रत्येक वह अमूर्त संपत्ति है ! जिसे कानून द्वारा पेटेंट, कॉपीराइट या ट्रेडमार्क के रूप में संरक्षित किया जा…

बौद्धिक दरिद्र से परामर्श क्यों नहीं लेना चाहिए

तीन दरिद्र थे ! एक प्राइमरी स्कूल का चपरासी, दूसरा अनपढ़ गृहस्थ महिला और तीसरा इन दोनों को सलाह देने वाला एक सूदखोर ज्योतिषी ! एक बार ज्योतिषी के मन में यह विचार आया कि मैं अपने आय को कैसे…

बीजाक्षर मंत्रों से भी शक्तिशाली क्या है

वैष्णव आचार्यों द्वारा बतलाया गया है कि बीजाक्षर मंत्रों का बहुत महत्व है, क्योंकि यह मंत्र शक्तिशाली ऊर्जा के स्रोत होते हैं। यह मंत्र किसी विशेष देवता या शक्ति को समर्पित होते हैं ! इनका जप करने से उन शक्तियों…

प्रत्येक 3 वर्ष में संस्थान की सफाई क्यों जरुरी है

बड़े-बड़े संस्थानों को चलाने वाले प्रबुद्ध व्यक्तियों का यह अनुभव है कि संस्था में प्रत्येक 3 वर्ष में संस्था को अपनी कार्य नीति में बड़ा बदलाव कर देना चाहिए ! जिससे संस्था के नाम पर व्याप्त भ्रष्टाचार उभर कर सामने…

परम गुप्त तंत्र मुद्रा विज्ञान पर विशेष सत्र  

हमारे मस्तिष्क का सीधा संबंध हमारी उंगलियों से है ! इस रहस्य को भगवान शिव ने तंत्र मुद्रा विज्ञान में हजारों साल पहले मनुष्य को बतला दिया था ! इसीलिए उंगलियों पर बनने वाली आकृति और हमारे मस्तिष्क के अंदर…

नास्तिक सापेक्ष शब्द है

नास्तिक होने का तात्पर्य मात्र हिन्दू जीवन शैली का विरोधी होना मात्र नहीं है, बल्कि किसी विशेष जीवन शैली या जीवन दर्शन ( धर्म ) को न मानने वाला भी नास्तिक ही होता है ! इस दुनिया में 6000 से…

धर्मो रक्षति रक्षितः का सिद्धान्त गलत है

‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ एक संस्कृत वाक्यांश है ! इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति धर्म की रक्षा करता है धर्म उस व्यक्ति की रक्षा करता है ! यह वाक्य महाभारत और मनुस्मृति में सिद्धान्त के रूप में मिलता है !…

धर्म का अनुकरण क्यों अनिवार्य है ?

धर्म ही मनुष्य की विशेषता है । धर्म विहीन स्वतन्त्रता, स्वेच्छाचारिता या उच्छृंखलता के ही रूप में परिणत हो जाती है । “सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्मात्म भाव” प्राप्त होने से पहले प्राणी को अवश्य ही धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक विभिन्न नियन्त्रणों के परतन्त्र…

दरिद्र मानसिकता का व्यक्ति संगठन के लिए क्यों घातक हैं

प्राय: समाज में देखा जाता है कि बड़े-बड़े संगठनों में दरिद्र मानसिकता के लोग संगठन विरोधी कार्यों में लिप्त पाये जाते हैं ! इसका पहला मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि दरिद्र व्यक्ति इसलिए दरिद्र होता है क्योंकि वह सामाजिक प्रतिष्पर्धा…