बिना मन लगे भी पूजा पाठ के लाभ मिलता है : Yogesh Mishra

मन अति चञ्चल बलवान् मथ डालने वाला है ! उसे रोकना वायु को रोकने की भाँति बहुत कठिन है ! ऐसा अर्जुन ने श्रीभगवान् से कहा ! श्री भगवान् ने भी बिना किसी विरोध के ही इस बात को स्वीकार कर लिया !

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवतद् दृढ़म् !
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ! !(गी.6/34) !
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् (गी.6/35) !

मानस में भी मनोनिग्रह की बड़ी दुर्लभता का कथन किया गया है ! जीतिहि मनहिं सुनिय अस रामचन्द्र के काज ! ! श्रीराम जी के राज्य में त्रेता सतयुग के समान हो गया था ! इस प्रकार जब त्रेता और सतयुग में भी मन को वश में करना कठिन था ! तो इस कठिन कलिकाल में मन को वश में करना तो सर्वथा ही असम्भव लगता है ! इतना ही नहीं वल्कि अनुभव तथा रामायण जी के अनुसार मन पाप में ही मगन रहना चाहता है ! उससे निकलना ही नहीं चाहता है !

इन गीता व मानस जी के वचनों से यह अति स्पष्ट होता है कि इस कलिकाल में मन का पाप रहित शुद्ध तथा वश में होना प्रायः असम्भव है ! ऐसी स्थिति में शुद्ध एवं अन्य चिन्तन से रहित मन को लगा कर पूजा पाठ ध्यान दान तीर्थ ! सेवन आदि करना भी असम्भव दीखता है ! अतः यह शंका होती ही है कि मन के लगे बिना ही किये गये पूजा पाठ आदि से कोई लाभ होता है या नहीं ?

किसी महात्मा की सेवा पूजा करने वाला व्यक्ति यदि ठीक समय पर नियमानुसार स्नान, भोजन, पादप्रक्षालन, औषधि, दान, आदि द्वारा उसकी सेवा पूजा कर देता है ! तो उसे महात्मा की सेवा से धन एवं पुण्य अवश्य प्राप्त होता है ! भले ही सेवा करते समय उसका मन अन्य के चिन्तन में मग्न रहा हो ! क्योंकि शारीरिक कर्म रूप सेवा तो उसने ठीक से की ही है ! इससे उसे उस महात्मा का आशिर्वाद तो प्राप्त होगा ही ! इसी प्रकार मन लगे बिना भी जो भगवान कि पूजा शास्त्र विधि पूर्वक की जाती है ! उसका फल भी अवश्य प्राप्त होता है !

इसी प्रकार अर्थ समझे बिना तथा मन लगे बिना भी किसी संगीतशाला में गान विद्या का विधानानुसार आनंद लिया जाये तो आंशिक रूप से ही सही पर उस गान का लाभ अवश्य मिलता है ! क्योंकि वाचिक ने कर्मरूप गान तो अपने विधानानुसार ही किया है ! इसी प्रकार अर्थ समझे बिना तथा मन लगे बिना भी शास्त्रीय विधि पूर्वक किये गये जप, स्तोत्र पाठ आदि का फल अवश्य मिलता है !

यहाँ ऐसी शंका की जा सकती है कि व्यग्रचित्तो हतो जपः ! (भागवत.5/73) ! व्यग्र ( चञ्चल) चित्त के कारण जप व्यर्थ होता है ! ऐसा भागवत जी में कहा गया है ! इसका समाधान यह है कि यह सत्य है कि मन लगाकर पाठ आदि करने पर जितना फल मिलता है ! उतना फल व्यग्रचित्त से जप आदि करने पर नहीं मिलता है ! इसी दृष्टि से उसे व्यर्थ कहा गया है ! व्यक्ति का कर्म सर्वथा व्यर्थ हो जाता है, ऐसा भागवत वचन का तात्पर्य नहीं है !

इसी प्रकार अर्थ समझकर पाठ आदि करने व सुनने से जितना लाभ होता है ! उतना लाभ अर्थ को समझे बिना अश्रद्धा से पाठ सुनने तथा करने से नहीं होता ! इसी दृष्टि से शास्त्रों में अश्रद्धा से तथा अर्थ समझे बिना पाठ करने या सुनने को कहीं-कहीं व्यर्थ बतलाया गया है !

वस्तुतः किस क्रिया, वचन और भाव से पाप या पुण्य की उत्पत्ति होती है ! यह बात शास्त्र गम्य है ! प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाण शास्त्र गम्य नहीं है ! क्योंकि पुण्य पाप प्रत्यक्षादि प्रमाणों के विषय ही नहीं हैं ! अतः पूजा पाठ, जप तीर्थ यात्रादि के लाभों का जैसा शास्त्रों में प्रतिपादन है ! उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिये ! लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पुरुषार्थ कर्म और स्थान का प्रभाव नहीं पड़ता है !

इन विषयों में इतना ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि शास्त्रों के पूर्व वचनों पर विचार करने से कहां क्या तात्पर्य निकलता है ! इस पर निर्णय लेने के पूर्व अवश्य चिंतन करें ! क्योंकि शास्त्र सर्वत्र अपने तात्पर्य अर्थ में ही सत्य होते हैं ! उनके शब्दों के अर्थ बदल देने से वह विकृत हो जायेंगे लेकिन विवेक का प्रयोग करना ही चाहिये !

तात्पर्य यह कि जिस किसी भी प्रकार से की गई आराधना, पूजा, साधना, जप, तप आदि कभी व्यर्थ नहीं जाता है ! यदि श्रद्धा की प्रधानता व निष्काम भाव की दृढ़ता हो तो उसका पूर्ण लाभ मिलता है अन्यथा आंशिक लाभ मिलता है ! भगवान् कभी भक्त कि त्रुटियों को नहीं देखते है ! वह तो बस प्रेम देखता है !

यदि कोई यह सोचता हो कि जब मन लगेगा तभी पूजा पाठ आदि करेंगे ! तो यह ठीक नहीं है ! न मन लगेगा, न पूजा पाठ होंगी ! हाँ यदि पूजा पाठ करते रहेंगे तो धीरे-धीरे मन भी लगने लगेगा ! अभ्यास व वैराग्य से ही साधना में निरन्तरता आती है !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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